गुरु ग्रंथ साहिब 8 · Jap · Guru Nanak Dev Ji
1(श्रम खंड में परमेश्वर की भक्ति को प्रभुख माना गया है) परमेश्वर की भक्ति करने का उद्यम करने वाले संतजनों की वाणी मधुर है।
2वहाँ (श्रम खण्ड में) पर अद्वितीय सुन्दरता वाले स्वरूप की गढ़न की जाती है।
3उनकी बातों का कथन नहीं किया जा सकता।
4यदि कोई उनकी महिमा कथन करने की चेष्टा करता भी है तो उसे बाद में पछताना पड़ता है।
5वहाँ पर वेद-श्रुति, ज्ञान, मन और बुद्धि गढ़े जाते हैं।
6वहाँ पर दिव्य बुद्धि वाले देवों व सिद्ध अवस्था की प्राप्ति वाली सूझ गढ़ी जाती है॥ ३६॥
7जिन उपासकों पर परमेश्वर की कृपा हुई उनकी वाणी शक्तिवान हो जाती है।
8जहाँ पर ये उपासक विद्यमान होते हैं वहाँ पर कोई और नहीं होता।
9उन उपासकों में देह को जीतने वाले योद्धा, इन्द्रियों को जीतने वाले महाबली तथा मन को जीतने वाले शूरवीर होते हैं।
10उन में प्रभु राम परिपूर्ण रहते हैं।
11उन निर्गुण स्वरूप राम के साथ महिमा रूपी सीता चन्द्रमा समान प्रकाशमान व मन को शीतल करने वाली है।
12ऐसा स्वरूप प्राप्त करने वालों के गुण कथन नहीं किए जा सकते।
13वे उपासक न तो मरते हैं और न ही ठगे जाते हैं,
14जिनके ह्रदय में परमात्मा राम का स्वरूप विद्यमान होता है।
15वहाँ कई लोकों के भक्त निवास करते हैं।
16जिनके हृदय में सत्यस्वरूप निरंकार वास करता है, वे आनंद प्राप्त करते हैं।
17सत्य धारण करने वालों के ह्रदय (सचखण्ड) में वह निरंकार निवास करता है; अर्थात् वैकुण्ठ लोक, जहाँ सद्गुणी व्यक्तियों का वास हैं, में वह सर्गुण स्वरूप परमात्मा रहता है।
18यह सृजनहार परमात्मा अपनी सृजना को रच-रचकर कृपा-दृष्टि से देखता है अर्थात् उसका पोषण करता है।
19उस सचखण्ड में अनन्त ही खण्ड, मण्डल व ब्रह्माण्ड है।
20यदि कोई उसके अन्त को कथन करे तो अन्त नहीं पा सकता, क्योंकि वह असीम है।
21वहाँ अनेकानेक लोक विद्यमान है और उनमें रहने वालों के अस्तित्व भी अनेक हैं।
22फिर जिस तरह वह सर्वशक्तिमान परमात्मा आदेश करता है उसी तरह वे कार्य करते हैं।
23अपने इस रचे हुए प्रपंच को देख कर व शुभाशुभ कर्मों को विचार कर वह प्रसन्न होता है।
24गुरु नानक जी कहते हैं कि उस निरंकार के मूल-तत्व का जो मैंने उल्लेख किया है उसे कथन करना अत्यंत कठिन हैII ३७॥
25इद्रिय-निग्रह रूपी भट्ठी हो, संयम रूपी सुनार हो।
26अचल बुद्धि रूपी अहरन हो, गुरु ज्ञान रूपी हथौड़ा हो।
27निरंकार के भय को धौंकनी तथा तपोमय जीवन को अग्नि ताप बनाओ।
28ह्रदय - प्रेम को बर्तन बनाकर उसमें नाम - अमृत को गलाया जाए।
29इसी सच्ची टकसाल में नैतिक जीवन को गढ़ा जाता है। अर्थात्-ऐसी टकसाल से ही सद् गुणी जीवन बनाया जा सकता है।
30जिन पर अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि होती है, उन्हीं को ये कार्य करने को मिलते हैं।
31हे नानक ! ऐसे सद् गुणी जीव उस कृपासागर परमात्मा की कृपा-दृष्टि के कारण कृतार्थ होते हैं। ॥ ३८ ॥
32श्लोक ॥
33समस्त सृष्टि का गुरु पवन है, पानी पिता है, और पृथ्वी बड़ी माता है।
34दिन और रात दोनों धाय एवं धीया (बच्चों को खिलाने वाले) के समान हैं तथा सम्पूर्ण जगत् इन दोनों की गोद में खेल रहा है।
35शुभ व अशुभ कर्मों का विवेचन उस अकाल-पुरुष के दरबार में होगा।
36अपने शुभाशुभ कर्मों के फलस्वरूप ही जीव परमात्मा के निकट अथवा दूर होता है।
37जिन्होंने प्रभु का नाम-सुमिरन किया है, वे जप-तप आदि की गई मेहनत को सफल कर गए हैं।
38गुरु नानक देव जी कथन करते हैं कि ऐसे सद्प्राणियों के मुख उज्ज्वल हुए हैं और कितने ही जीव उनके साथ, अर्थात् उनका अनुसरण करके, आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए हैं।॥ १॥
39सो दरु रागु आसा महला १
40ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
41हे निरंकार ! तेरा वह (अकथनीय) द्वार कैसा है, वह निवास-स्थान कैसा है, जहाँ पर विराजमान होकर तुम सम्पूर्ण सृष्टि का प्रतिपालन करते हो ? (इसके बारे में कैसे कथन करूं)।
42हे अनन्त स्वरूप ! तुम्हारे द्वार पर अनगिनत दिव्य नाद गूंज रहे हैं, कितने ही वहाँ पर नादिन् हैं।
43तुम्हारे द्वार पर कितने ही रागिनियों के संग राग कहते हैं और कितने ही वहीं पर उन रागों व रागिनियों को गाने वाले हैं।
44(आगे गाने वालों का वर्णन करते हैं) हे अकाल पुरुष ! तुझे पवन, जल व अग्नि देव आदि गाते हैं और धर्मराज भी तुम्हारे द्वार पर तुम्हारा यश गाता है।
45जीवों के शुभाशुभ कर्म लिखने वाले चित्र-गुप्त तुम्हारा ही यशोगान करते है तथा लिख कर शुभ व अशुभ कर्मों का विचार करते हैं।
46शिव व ब्रह्मा अपनी दैवी-शक्तियों सहित तुम्हारा गुणगान कर रहे हैं, जो तुम्हारे संवारे हुए सदैव शोभा पा रहे हैं।
47देवताओं के संग अपने सिंहासन पर बैठा इन्द्र भी तुम्हारी महिमा को गा रहा है।
48समाधि में स्थित हुए सिद्ध भी तुम्हारा यश गा रहे हैं, विचारवान साधु भी तुम्हारी प्रशंसा कर रहे हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं