गुरु ग्रंथ साहिब 89 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1जिन पर परमात्मा दयालु होता है, वह सतिगुरु पर नतमस्तक होते हैं।
2लोक तथा परलोक में उनके चेहरे उज्ज्वल होते हैं, वह परमात्मा के दरबार में प्रतिष्ठा की पोशाक धारण करके जाते हैं ॥ १४ ॥
3श्लोक महला २ ॥
4जो सिर ईश्वर की याद में नमन नहीं होता, उस सिर को काट देना चाहिए।
5हे नानक ! उस मनुष्य ढांचे को लेकर जला देना चाहिए, जिस मनुष्य ढांचे में ईश्वर से विरह की पीड़ा नहीं II१II
6महला ५॥
7हे नानक ! जो जीव-स्त्री जगत् के मूल प्रभु को भूली हुई है, वह पुनः पुनः जन्मती और मरती है।
8वह कस्तूरी के भ्रम में गंदे पानी के गङ्गे में पड़ी हुई है ॥ २॥
9पउड़ी ॥
10हे मेरे मन ! तू हरि-परमेश्वर के ऐसे नाम का ध्यान कर, जो समस्त जीवों पर अपना हुक्म चलाता है।
11हे मेरे मन ! तू हरि-परमेश्वर के ऐसे नाम का जाप कर, जो अंतिम समय तुझे मोक्ष प्रदान करेगा।
12हे मेरे मन ! तू हरि-परमेश्वर के ऐसे नाम का सिमरन कर, जो तेरे चित्त की समस्त तृष्णाएँ एवं भूख को मिटा देता है।
13वे गुरमुख बड़े सौभाग्यशाली हैं, जो उस परमेश्वर के नाम का चिन्तन करके निन्दकों-दुष्टों को अपने अधीन कर लेते हैं।
14हे नानक ! उस नाम की आराधना करो जो सबसे महान है; प्रभु ने तो समस्त जीवों को नाम के समक्ष झुका दिया है ॥१५॥
15श्लोक महला ३॥
16कुरूप एवं आचरणहीन जीव-स्त्री बड़े सुन्दर वस्त्र सुशोभित करती है परन्तु मन में खोट होने के कारण वह झूठी है।
17वह अपने पति-प्रभु की इच्छानुसार नहीं चलती, वह गंवार अपने पति-प्रभु पर आदेश चलाती है।
18जो जीव-स्त्री गुरु की आज्ञानुसार चलती है, वह समस्त दुःखों से बच जाती है।
19परमात्मा ने पूर्व-कर्म फल रूप में जो लिख दिया है, वह मिटाया अथवा बदला नहीं जा सकता।
20इसलिए उसे अपना तन-मन पति-परमेश्वर को अर्पण करके नाम में अपना प्रेम लगाना चाहिए।
21अपने मन में विचार करके देख लो कि नाम-स्मरण के अलावा किसी को भी परमात्मा प्राप्त नहीं हुआ।
22हे नानक ! वहीं जीव-स्त्री सुन्दर एवं सुलक्षणा है, जिसकी सेज पर सृजनहार स्वामी रमण करता है ॥१॥
23महला ३॥
24माया का मोह अज्ञानता का अँधकार है यह मोह रूपी अँधेरा एक समुद्र की तरह है, जिसका कोई आर-पार नजर नहीं आता।
25अज्ञानी मनमुख व्यक्ति ईश्वर के नाम को विस्मृत करके डूब जाते हैं और भयानक दुःख सहन करते हैं।
26वह माया के मोह में मुग्ध हुए प्रातः काल उठकर बहुत सारे कर्मकाण्ड करते हैं।
27जो व्यक्ति अपने सतिगुरु की सेवा करते हैं, वह भवसागर से पार हो जाते हैं।
28हे नानक ! गुरमुख जन सत्यनाम को अपने हृदय में लगा कर रखते हैं और सत्य प्रभु में लीन हो जाते हैं ॥२ ॥
29पउड़ी ॥
30ईश्वर सागर, मरुस्थल, धरती एवं गगन के अन्दर परिपूर्ण है, उसके अलावा अन्य दूसरा कोई नहीं।
31ईश्वर अपने दरबार में विराजमान होकर जीवों के कर्मों का स्वयं न्याय करता है और समस्त झूठों को पीटकर बाहर निकाल देता है।
32सत्यवादियों को परमेश्वर शोभा प्रदान करता है और कर्मानुसार प्रत्येक प्राणी को फल देकर न्याय करता है।
33इसलिए तुम सभी हरि की महिमा- स्तुति करो, जो निर्धनों एवं अनाथों की रक्षा करता है।
34वह भद्रपुरुषों को मान-प्रतिष्ठा प्रदान करता है और दोषियों को वह दण्ड देता है ॥१६ ॥
35श्लोक महला ३॥
36मनमुख जीव-स्त्री विषय-विकारों से मलिन, कुलक्षणी एवं धुरी नारी है।
37वह अपने स्वामी एवं घर को त्याग देती हैं और पराए पुरुष के साथ प्रीत करती है।
38उसकी तृष्णा कभी बुझती नहीं, वह तृष्णा अग्नि में जलती है और तृष्णा अग्नि में जलती हुई विलाप करती रहती है।
39हे नानक ! हरिनाम के अलावा वह कुरुप और कुलक्षणी है और उसके स्वामी ने उसे त्याग दिया है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं