गुरु ग्रंथ साहिब 897 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1ओम् को हमारा प्रणाम है,
2वह भगवंत, पृथ्वीपालक, स्रष्टा सब स्थानों पर बसा हुआ है॥ १॥ रहाउ॥
3वह समूचे जगत् का मालिक है, जगत् को जीवन देने वाला है,
4उस भयभंजन की हृदय में आराधना करो।
5हे ऋषिकेष, हे गोपाल गोविंद,
6हे मुक्तिदाता ! तू विश्वव्यापक है॥ २॥
7एक तू ही मेहरबान मौला है
8दुनिया में कितने ही पीर-पैगम्बर एवं शेख हैं परन्तु
9तू सबके दिलों का मालिक है और सबसे इन्साफ करता है।
10तू कुरान-कतेब से भी पवित्र है॥ ३॥
11हे नारायण नृसिंह रूप ! तू बड़ा दयालु है।
12घट-घट में व्यापक राम सबके जीवन का आधार है।
13वह वासुदेव सब जीवों में निवास करता है,
14उसकी लीला को समझा नहीं जा सकता ॥ ४ ॥
15हे बनाने वाले ! अपनी मेहर एवं दया करो।
16हे सृजनहार ! मुझे अपनी भक्ति एवं बंदगी दीजिए।
17हे नानक ! गुरु ने मेरे सारे भ्रम दूर कर दिए हैं और
18सत्य तो यही है कि परब्रह्म-अल्लाह एक ही हैं।॥ ५॥ ३४॥ ४५ ॥
19रामकली महला ५ ॥
20करोड़ों जन्मों के सब पाप नाश हो जाते हैं,
21हरि-हरि नाम का जाप करने से कोई संताप नहीं लगता।
22यदि गुरु के सुन्दर चरण-कमल मन में निवसित हो जाएँ,
23तो सारे महाविकार भी तन से दूर हो जाते हैं।॥ १॥
24हे प्राणी ! ईश्वर का यशगान करो।
25सच्चे प्रभु की कथा अकथनीय है और आत्म ज्योति परम-ज्योति में विलीन हो जाती है॥ १॥ रहाउ॥
26सारी भूख एवं तृष्णा नाश हो गई है
27जब संतों की कृपा से अबिनाशी प्रभु का जाप किया।
28रात-दिन प्रभु की भक्ति करनी चाहिए,
29हरि से मिलन की यही निशानी है॥ २॥
30प्रभु मुझ पर दयालु हो गया है, जिससे सब विपत्तियां मिट गई हैं।
31गुरु का दर्शन करके निहाल हो गया हूँ।
32मेरे पूर्व जन्म के कर्मो का भाग्य उदय हो गया है और
33रसना से नित्य भगवान का गुणगान करता रहता हूँ॥ ३॥
34भगवान के संत सदैव मान्य होते हैं,
35संतजनों के माथे पर स्वीकृत का नाम-रूपी निशान पड़ा होता है।
36हे नानक ! यदि कोई व्यक्ति परमात्मा के दास की चरण-धूलि प्राप्त कर ले तो
37उसकी परमगति हो जाती है।॥ ४॥ ३५॥ ४६॥
38रामकली महला ५ ॥
39गुरु के दर्शन पर कुर्बान जाना चाहिए,
40हृदय में उसके चरण-कमल का ध्यान करना चाहिए।
41अपने मस्तक पर संतों की चरण-धूलि लगानी चाहिए,
42इससे जन्म-जन्मांतर की दुर्मति की मैल दूर हो जाती है।॥ १॥
43जिस गुरु से भेंट करने से अभिमान मिट जाता है,
44सब परब्रह्म ही नजर आता है, हे भगवान ! अपनी पूर्ण कृपा करो ॥ १॥ रहाउ॥
45गुरु की कीर्ति यही है कि हरि-नाम का जाप करना चाहिए।
46गुरु की भक्ति यही है कि सदैव परमात्मा का गुणगान करो।
47गुरु की स्मृति को अपने निकट समझो।
48गुरु का शब्द सत्य जान कर मानो ॥ २ ॥
49गुरु के उपदेश द्वारा सुख-दुख को समान समझना चाहिए,
50फिर कभी भी तृष्णा एवं भूख नहीं लगती।
51शब्द-गुरु द्वारा मन में संतोष पैदा हो जाता है और तृप्ति हो जाती है।
52गोविंद का भजन करने से सब पाप ढक जाते हैं। ३॥
53गुरु ही परमेश्वर एवं गुरु ही गोविन्द है।
54गुरु ही दाता, दयालु एवं क्षमावान् है।
55हे नानक ! जिसका मन गुरु के चरणों में लगता है,
56वही पूर्ण भाग्यवान् है॥ ४॥ ३६॥ ४७॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं