गुरु ग्रंथ साहिब 895 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1और वह संतों के प्राणों का आधार है।
2वह सबसे ऊँचा एवं अपरम्पार है॥ ३॥
3वही सुमति है, जिस द्वारा भगवान् का सिमरन किया जाता है।
4वह जिस पर अपनी कृपा करता है, उसे ही सुमति देता है।
5हरि का नाम परम सुख एवं आनंद प्रदान करने वाला है,
6अतः हे नानक ! गुरु को मिलकर नाम ही जपा है॥ ४॥ २७ ॥ ३८ ॥
7रामकली महला ५ ॥
8अपनी सब चतुराइयाँ छोड़ दो और
9सेवक बनकर गुरु की सेवा करो।
10जो अपना सारा अहंत्व मिटा देता है,
11उसे मनोवांछित फल प्राप्त होता है॥ १॥
12अपने गुरु के साथ सावधान होकर रहो,
13आशा-अभिलाषा सब पूर्ण हो जाएँगी और गुरु से सर्व भण्डार हासिल हो जाएँगे॥ १॥ रहाउ॥
14अन्य कोई नहीं जानता कि
15सतगुरु ही निरंजन है।
16गुरु को मनुष्य का रूप न समझो।
17मुझ मानहीन को भी उसके द्वार पर सम्मान मिला है॥ २॥
18भगवान् के रूप गुरु का सहारा लो,
19अन्य सब आशाएँ त्याग दो।
20गुरु से हरि-नाम का भण्डार मांगो,
21तो दरबार में आदर प्राप्त हो जाएगा।॥ ३॥
22गुरु वचन का जाप करो, यही मंत्र है,
23यही भक्ति का सार तत्व है।
24जब सतगुरु दयालु हो गया तो
25दास नानक भी निहाल हो गया।॥ ४॥ २८ ॥ ३६ ॥
26रामकली महला ५ ॥
27जो कुछ हो रहा है, उसे ही भला मानो।
28अपना अभिमान त्याग दो और
29दिन-रात भगवान का गुणगान करो,
30यही मानव-जीवन का पूर्ण मनोरथ है॥ १॥
31संतों के संग ईश्वर का नाम जपो एवं आनंद करो।
32अपनी बुद्धिमता एवं चतुराई को छोड़कर गुरु के निर्मल मंत्र का जाप करो॥ १॥ रहाउ॥
33मन में एक परमात्मा की आशा करो,
34निर्मल हरि-नाम का जाप करो।
35गुरु के चरणों को प्रणाम करो,
36भवसागर से उद्धार हो जाएगा।॥ २॥
37सबकुछ देने वाले दातार का
38कोई अन्त एवं आर-पार नहीं है,
39जिसके घर में सर्व भण्डार हैं,
40अंत में वही रक्षा करने वाला है॥ ३॥
41नानक ने वह कोष पा लिया है,
42जो हरि का निर्मल नाम है,
43जो भी पावन हरि नाम का जाप करता है, उसकी गति हो जाती है।
44हे नानक ! भाग्य से ही इसकी प्राप्ति होती है॥ ४॥ २६ ॥ ४०॥
45रामकली महला ५ ॥
46हे मानव ! अपना दुर्लभ जीवन सफल कर ले;
47इस तरह जीवन बाजी हार कर दरबार में नहीं जाना पड़ेगा।
48लोक-परलोक में तेरी बड़ी प्रशंसा होगी तथा
49अन्तिम समय परमात्मा यमों से बचा लेगा।॥ १॥
50राम का गुणगान करो,
51लोक-परलोक दोनों सुखद हो जाएँगे, अद्भुत परमेश्वर का ध्यान करते रहो॥ १॥ रहाउ ॥
52उठते-बैठते हर वक्त परमात्मा का जाप करो,
53इससे दुख-संताप नाश हो जाएँगे,
54सब शत्रु भी मित्र बन जाएँगे, और
55तेरा चित्त भी निर्मल हो जाएगा ॥ २॥
56सबसे उत्तम यही कर्म है,
57सब धमों में यही श्रेष्ठ धर्म है कि भगवान् का सिमरन करते रहो।
58भगवान् का सिमरन करने से तेरा उद्धार हो जाएगा और
59जन्म-जन्मांतरों के किए पापों का भार उतर जाएगा ॥ ३ ॥
60तेरी हर आशा पूर्ण हो जाएगी और
61तेरी यम की फॉसी भी कट जाएगी।
62हे नानक ! गुरु का उपदेश सुनना चाहिए,
63इससे सहज सुख में समाया जा सकता है॥ ४॥ ३०॥ ४१॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं