सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 894 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1जिस गुफा में उसका आसन है, वहाँ उसने शून्य समाधि लगाई है।

2वहाँ पर केवल पूर्ण ब्रह्म का ही निवास है।

3प्रभु वहाँ पर अपने भक्तों के साथ गोष्ठी करता है।

4वहाँ न कोई हर्ष है, न कोई शोक है और न ही जन्म-मरण का बन्धन है ॥ ३॥

5भगवान् ने कृपा करके जिसे स्वयं दिलवाया है,

6उसने ही साधुओं की संगति में हरि-धन प्राप्त किया है।

7हे दयालु परमपुरुष ! नानक की तुझसे प्रार्थना है कि

8हरि-नाम ही मेरा जीवन उपयोग एवं जीवन राशि है॥ ४॥ २४॥ ३५ ॥

9रामकली महला ५ ॥

10उसकी महिमा वेद भी नहीं जानते,

11ब्रह्मा भी उसका भेद नहीं जानता,

12बड़े-बड़े अवतार भी उसका अन्त नहीं जानते,

13चूंकि परब्रहा-परमेश्वर बेअंत है॥ १॥

14वह अपनी गति स्वयं ही जानता है,

15सुन-सुनकर अन्य लोग उसका बखान करते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥

16शिवशंकर उसका भेद नहीं जानता,

17खोजते-खोजते बड़े-बड़े देवता भी हार गए।

18देवियाँ भी उसका मर्म नहीं जानती

19क्योकि सबसे ऊपर अदृष्ट परब्रहा है॥ २॥

20वह अपने रंग में स्वयं ही लीला करता है,

21वह स्वयं ही किसी को बिछोड़ देता है और किसी को मिला लेता है।

22उसकी मर्जी से कुछ जीव भटकते रहते हैं और किसी को उसने भक्ति में लगाया हुआ है।

23वह अपनी जगत्-लीला को स्वयं ही जानता है॥ ३॥

24संतों की सच्ची शिक्षा सुनो,

25वे वही बोलते हैं, जो अपनी आँखों से देखते हैं।

26उसे पाप-पुण्य का कोई लेप नहीं लगता,

27नानक का प्रभु स्वयंभू है ॥४॥ २५॥ ३६॥

28रामकली महला ५ ॥

29मैंने सोच-समझकर कोई शुभ कर्म नहीं किया,

30मेरे पास सुरति, बुद्धि एवं कोई ज्ञान भी नहीं है,

31और तो और कोई जाप, कोई तपस्या, कोई शील एवं धर्म भी नहीं है।

32मैं कुछ भी नहीं जानता कि कैसे कर्म करना उचित है॥ १॥

33हे ठाकुर जी, हे मेरे प्रियतम प्रभु !

34तेरे बिना मेरा अन्य कोई आधार नहीं, चाहे भूल-चूक करता रहता हूँ फिर भी तेरा ही अंश हूँ॥ १॥ रहाउ॥

35न मेरे पास ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ हैं और न ही ज्ञान का प्रकाश है।

36मेरा निवास तो विषय-विकारों एवं व्याधियों के गाँव में है।

37हे मेरे प्रभु ! एक तू ही सबकुछ करने में समर्थ है और

38मेरे मन में तेरे नाम का ही सहारा है॥ २॥

39हे प्रभु ! मन में यही सुख है और यही सुन-सुनकर जी रहा हूँ कि

40तेरा नाम सब पापों का नाश करने वाला है।

41तू असंख्य जीवों का दाता है,

42जिसे तू ज्ञान देता है, वह तेरी महिमा को समझ जाता है॥ ३॥

43जिसे भी तूने उत्पन्न किया है, उसे तेरी ही आशा है।

44सभी जीव गुणों के भण्डार परमात्मा की ही आराधना करते हैं।

45दास नानक तुझ पर कुर्बान जाता है चूंकि

46मेरा मालिक बेअंत एवं सब पर मेहरबान है॥ ४ ॥ २६॥ ३७ ॥

47रामकली महला ५ ॥

48दयालु परमेश्वर सबका रखवाला है,

49एक पल भर के लिए उसका चिंतन करने से करोड़ों जन्मों का बंधन नाश हो जाता है।

50सभी जीव उसकी ही आराधना करते हैं।

51जिसे गुरु-मंत्र मिल जाता है, वह प्रभु को पा लेता है॥ १ ॥

52मेरा प्रभु सब जीवों का दाता है,

53वह पूर्ण परमेश्वर सबका स्वामी हर हृदय में बसा हुआ है॥ १॥ रहाउ॥

54मेरे मन ने उसकी ही ओट ली है,

55जिससे सब बन्धनों से छुटकारा हो गया है।

56उस परमानंद को हृदय में जपने से

57मन में आनंद उत्पन्न हो गया है॥ २॥

58भगवान् की शरण संसार-सागर से पार करवाने वाला जहाज है।

59उसके चरणों में जीवन दान मिलता है

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं