सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 892 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji

1जब कोई मनुष्य माया को आदर देता है तो

2वह अपने ऊपर बड़ा घमण्ड करती है।

3जब कोई उसे अपने मन में से निकाल देता है,

4तब वह दासी बनकर उसकी सेवा करती है॥ २॥

5वह मीठे वचन बोलकर मनुष्य को मोहित करती हैं, लेकिन अन्त में धोखा ही देती है।

6वह एक स्थान पर कहीं भी नहीं टिकती,

7उसने ब्रह्माण्ड के अनेक जीवों को मोहित किया हुआ है।

8लेकिन राम के भक्तों ने उसे दुकड़े-टुकड़े कर दिया है॥ ३॥

9जो माया माँगता है, वह भूखा ही रहता है।

10जो इसके साथ लीन रहता है, उसे कुछ भी हासिल नहीं होता।

11हे नानक ! जो इसे त्याग कर सत्संगति करता है,

12वह खुशनसीब मुक्त हो जाता है।॥ ४॥ १८॥ २९ ॥

13रामकली महला ५ ॥

14सब जीवों में राम का रूप देखो;

15एक प्रभु ही सबमें व्याप्त है।

16उस अमूल्य-रत्न को अपने हृदय में ही समझो और

17अपनी वस्तु को अपने हृदय में ही पहचानो ॥ १॥

18संतों की कृपा से नामामृत का पान करो।

19उत्तम भाग्य हो तो ही इसे पाया जा सकता है और जीभ से चखे बिना इसके स्वाद को कैसे जाना जा सकता है॥ १॥ रहाउ॥

20अठारह पुराणों एवं चार वेदों को सुनकर भी मनुष्य बहरा ही बना हुआ है।

21करोड़ों सूर्यो का प्रकाश हो तो भी अंधे को अंधेरा ही नजर आता है।

22पशु का प्रेम घास से होता है और वह उसी में लीन रहता है।

23जिस व्यक्ति को ज्ञान नहीं होता, वह किस विधि द्वारा समझ सकता है॥ २॥

24जानने वाला प्रभु सब कुछ जानता है तथा

25ताने-बाने की तरह पूणर्तया भक्तों के संग रहता है।

26हे नानक ! जो खुशी-खुशी अपने प्रभु का स्तुतिगान करता है,

27यमदूत भी उसके निकट नहीं आता ॥ ३॥ १९ ॥ ३० ॥

28रामकली महला ५ ॥

29सतगुरु ने मुझे नाम देकर पवित्र कर दिया है।

30हरि-नाम रूपी धन ही मेरी राशि है और माया की ओर से निराश रहता हूँ।

31उसने मेरे बंधन काटकर हरि की सेवा में लगा दिया है।

32अब मैं हरि की भक्ति एवं उसके ही गुण गाता रहता हूँ॥ १॥

33मन में अनहद ध्वनि का वाद्य बज रहा है।

34हरि के भक्त बड़े आनंद से उसका स्तुतिगान कर रहे हैं और गुरुदेव ने इन्हें बड़ाई प्रदान की है॥ १॥ रहाउ॥

35पूर्व भाग्य उदय हो गया है और

36जन्म-जन्मांतर का सोया हुआ मन जाग गया है।

37साधुओं की संगति में दूसरों के प्रति घृणा दूर हो गई है।

38अब मन-तन हरेि के रंग में ही लीन रहता है।॥ २ ।

39रखवाले परमेश्वर ने दया करके रक्षा की है,

40न कोई सेवा की और न ही कोई साधना की है।

41अपनी कृपा करके प्रभु ने मुझ पर दया की है और

42दुखों के सागर में मुझ डूब रहे को निकाल लिया है॥ ३॥

43परमात्मा की महिमा सुन-सुनकर मेरे मन में चाव पैदा हो गया है,

44इसलिए आठ प्रहर हरि के गुण गाता रहता हूँ।

45उसकी स्तुति गाते-गाते हमने परमगतेि पा ली है।

46हे नानक ! गुरु की कृपा से भगवान में ही लगन लगाई है॥ ४॥ २०॥ ३१॥

47रामकली महला ५ ॥

48नासमझ जीव कौड़ियों के बदले अमूल्य नाम-रत्न को त्याग देता है।

49जो माया उसका साथ छोड़ जाती है, वह उसे ही हासिल करने का यत्न करता है।

50वह उसे संचित करता है जो एक तुच्छ वस्तु है।

51माया के मोह में जीव टेढ़े राह ही चलता है॥ १॥

52हे बदनसीब ! क्या तुझे शर्म नहीं आती कि

53जो पूर्ण परमेश्वर सुखों का सागर है, तूने उसे मन में कभी याद ही नहीं किया ॥ १॥ रहाउ॥

54उसे नामामृत कड़वा लगता है और माया रूपी विष मीठा लगता है।

55शाक्त की यही हालत मैंने अपने नयनों से देखी है।

56वह झूठ, कपट एवं अहंकार में ही मस्त रहता है लेकिन

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं