गुरु ग्रंथ साहिब 890 · Raag Raamkalee · Guru Arjan Dev Ji
1अपनी उम्र की तीसरी अवस्था में वह धन-दौलत संचित करता रहता है और
2जब वह बूढ़ा हो जाता है तो धन इत्यादि सबकुछ छोड़कर पछताता हुआ यहाँ से चला जाता है।॥ २॥
3चिरकाल से ही जीव ने दुर्लभ मानव-देह प्राप्त की है,
4लेकिन नामविहीन देह मिट्टी हो जाती है।
5यह मूर्ख पशुओं एवं प्रेत से भी बुरी है
6जिसने रचना की है, अगर उसे ही नहीं बूझती है।॥ ३॥
7हे स्रष्टा, हे गोविंद गोपाल ! हमारी विनती सुनो,
8तू दीनदयाल एवं सदा कृपा का घर है,
9जब तू छुड़ाता है तो ही हमारे बंधन छूटते हैं।
10नानक कहते हैं कि हे परमेश्वर ! यह जगत् अन्धा है, क्षमा करके अपने साथ मिला लो॥४॥१२॥२३॥
11रामकली महला ५ ॥
12ईश्वर ने पंच तत्वों के संयोग से यह शरीर बनाया है,
13लेकेिन नादान जीव इसके साथ ही लीन रहता है।
14वह नित्य इसका पोषण एवं देखभाल करता है,
15लेकिन अन्तिम समय यह शरीर छोड़कर चला जाता है॥ १॥
16हे प्राणी, नाम के बिना सब झूठ ही है।
17गोविन्द के भजन के बिना जो प्राणी सांसारिक पदार्थों में ही लीन हैं, उन सब को माया ने ठग लिया है॥ १॥ रहाउ॥
18तीर्थों पर स्नान करने से भी मन की मैल नहीं उतरती और
19सभी धर्म-कर्म अहंत्व का प्रसार है।
20लोक-दिखावा करने से गति नहीं होती और
21नामविहीन जीव रोता हुआ यहाँ से चल देता है॥ २॥
22हरि-नाम के बिना अहं के कपाट नहीं टूटते,
23सभी शास्त्रों एवं स्मृतियों का भलीभांति विश्लेषण करके देख लिया है
24वही मनुष्य नाम जपता है, जिससे ईश्वर स्वयं जाप करवाता है।
25इस प्रकार जीव सभी फल पाकर सुखी रहता है॥ ३॥
26हे दुनिया के रखवाले, हमारी रक्षा करो;
27हे प्रभु! जीवन के तमाम सुख तेरे ही हाथ में हैं।
28हे स्वामी ! तू जिधर लगाता है, हम उधर ही लग जाते हैं।
29हे नानक ! मेरा मालिक अन्तर्यामी है॥ ४॥ १३॥ २४॥
30रामकली महला ५ ॥
31परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसे ही सुख मान लिया है।
32नासमझ मन सत्संगति में प्रसन्न हो गया है।
33अब यह डोलता नहीं, अपितु स्थिर हो गया है।
34यह मन सत्य का चिंतन करके सत्य में ही विलीन हो गया है॥ १॥
35मेरा दुख एवं सारा रोग दूर हो गया है,
36जब से प्रभु की आज्ञा मन में मानी है, महापुरुषों का साथ भी मिल गया है॥ १॥ रहाउ॥
37सब कार्य पवित्र हो गए हैं और सबकुछ निर्मल हो गया है।
38जो कुछ प्रभु करता है, वही मेरे लिए भला है।
39वह जहाँ भी मुझे रखता है, वही मुक्ति का स्थान है।
40जो वह जपाता है, वही उसका नाम है॥ २॥
41जिस स्थान पर साधु अपने चरण रखते हैं, वह अड़सठ तीर्थ बन जाता है।
42जहाँ भी वे प्रभु-नाम का उच्चारण करते हैं, वही वैकुण्ठ बन जाता है।
43जब उनके दर्शन प्राप्त होते हैं तो बड़ा आनंद मिलता है।
44वे तो नित्य ही प्रभु का गुणगान करते रहते हैं।॥ ३॥
45उस दयालु सत्यपुरुष का प्रताप सारे विश्व में फैला हुआ है,
46जो परमात्मा सर्वव्यापक है।
47मन के सारे कपाट खुल गए और सारे भ्रम दूर हो गए हैं
48जब नानक की पूर्ण गुरु से भेंट हुई है ४॥ १४॥ २५॥
49रामकली महला ५ ॥
50उसे करोड़ों ही जप-तप का फल मिल जाता है,
51ऋद्धियाँ-सिद्धियों, बुद्धि एवं दैवीय ज्ञान की उसे प्राप्ति हो जाती है और
52वह अनेक प्रकार के रूप-रंग एवं रसों को भोगता रहता है,
53जिस गुरुमुख के हृदय में पल भर के लिए नाम स्थित हो जाता है ॥ १॥
54हरि के नाम की ऐसी कीर्ति है,
55जिसकी कीमत को आंका नहीं जा सकता ॥ १॥ रहाउ ॥
56वही व्यक्ति शूरवीर, धैर्यवान एवं बुद्धिमान है,
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं