गुरु ग्रंथ साहिब 88 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji
1जो व्यक्ति अपने सतिगुरु की सेवा करते हैं, वह अपना सिर प्रभु के लेखे में लगा देते हैं अर्थात् वह अपना जन्म सफल कर लेते हैं।
2ऐसा मनुष्य अपने अहंकार का नाश करके सत्यस्यरूप ईश्वर की प्रीति में लीन रहते हैं।
3जिन्होंने सतिगुरु की सेवा नहीं की, वह मनुष्य अपना जीवन व्यर्थ गंवा देते हैं।
4हे नानक ! परमात्मा वहीं कुछ करता है, जो कुछ उसे अच्छा लगता है उसमें किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं ॥१॥
5महला ३॥
6जिसका मन पापों में घिरा हुआ है, यह मंदे कर्म करता है।
7ज्ञानहीन मनुष्य माया के मोह में फँसकर माया की पूजा करते हैं।
8जिसके फलस्वरुप उन्हें भगवान के दरबार में दण्ड मिलता है; अतः हमें सदैव ही भगवान की पूजा करनी चाहिए परन्तु सतिगुरु के बिना मनुष्य को ज्ञान नहीं मिलता।
9सतिगुरु की आज्ञा में रहने वाले प्राणी को ईश्वर की दया से जप-तप, संयम सब कुछ सहज ही मिल जाता है।
10हे नानक ! भगवान की सेवा-भक्ति उसके चरणों में सुरति लगाने से होती है; जो भगवान को बेहतर लगता है, वहीं उसे स्वीकार होता है ॥ २ ॥
11पउड़ी ॥
12हे मेरे मन ! उस हरि-परमेश्वर के नाम का हमेशा भजन करो, जिससे तुझे दिन-रात सदैव सुख उपलब्ध होता है।
13हे मेरे मन ! तू हरिनाम का भजन कर, जिसका सिमरन करने से तेरे पाप मिट जाते हैं।
14हे मेरे मन ! उस हरि-परमेश्वर के नाम का जाप करो, जिससे दरिद्रता, दुख एवं भूख सब दूर हो जाती है।
15हे मेरे मन ! तू हरिनाम का चिन्तन कर, जिससे जिज्ञासु की सतिगुरु से आसक्ति होती है।
16जिसके माथे पर परमेश्वर ने भाग्य लिखा है, वह अपने मुख से हरि के नाम का भजन करता है ॥१३॥
17श्लोक महला ३॥
18जो प्राणी सतिगुरु की सेवा नहीं करते और न ही गुरु-शब्द का चिन्तन करते हैं,
19उनके अन्तर्मन में ज्ञान प्रवेश नहीं करता और वह इस जगत् में मृतक समान हैं।
20ऐसे प्राणी चौरासी लाख योनियों में चक्र काटते हैं और जीवन-मृत्यु के चक्र में पड़कर नष्ट होते हैं।
21सतिगुरु की सेवा वही करता है, जिससे प्रभु स्वयं करवाता है।
22सतिगुरु में नाम रूपी खजाना है, जो प्रभु की दया से उपलब्ध होता है।
23जो व्यक्ति गुरु की वाणी द्वारा सत्य प्रभु के प्रेम में मग्न रहते हैं, उनकी सच्ची सुरति हमेशा ही प्रभु में लगी रहती है।
24हे नानक ! जिसे परमात्मा अपने साथ मिला लेता है, वह उससे कभी भी जुदा नहीं होता और सहज ही उसमें लीन हो जाता है।॥ १ ॥
25महला ३॥
26भगवद् भक्त का पद उसी को दिया जा सकता है, जो भगवान को जानता है।
27गुरु की कृपा से वह अपने स्वरूप को पहचान लेता है।
28वह अपने भटकते हुए मन को संयमित करके एक स्थान पर स्थिर कर देता है।
29वह जीवित ही मृतक समान रहता है और हरिनाम का जाप करता है।
30ऐसा भगवत भक्त ही उत्तम होता है;
31हे नानक ! वह सत्य (परमात्मा) में ही समा जाता है ॥ २॥
32महला ३ ॥
33जिस व्यक्ति के हृदय में छल-कपट है और वह अपने आपको सच्चा भक्त कहलवाता है।
34ऐसा पाखंडी व्यक्ति परमात्मा को कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता।
35जो व्यक्ति पराई निंदा करता है, वह अपने हृदय को अहंकार की मैल लगाता रहता है।
36वह स्नान करके बाहर से शरीर की मैल को ही स्वच्छ करता है परन्तु उसके मन की अपवित्रता दूर नहीं होती।
37साधु-संतों से वह विवाद खड़ा कर लेता है।
38वह द्वैत-भाव में लीन हुआ दिन-रात दुखी रहता है।
39वह हरि नाम का चिन्तन नहीं करता और अधिकतर कर्मकाण्ड करता है।
40जो कुछ उसकी किस्मत में पूर्व-जन्म के कर्मों द्वारा लिखा हुआ है, वह मिटाया नहीं जा सकता।
41हे नानक ! सतिगुरु की सेवा के बिना वह मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता ॥३॥
42पउड़ी ॥
43जो व्यक्ति सतिगुरु को स्मरण करते हैं, वह जलकर राख नहीं होते।
44जो व्यक्ति सतिगुरु का चिन्तन करते हैं, वह संतुष्ट और तृप्त हो जाते हैं।
45जो व्यक्ति सतिगुरु का ध्यान करते हैं, उनको मृत्यु का कोई भय नहीं होता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं