सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 882 · Raag Raamkalee

1रामकली महला ४ ॥

2हे सतगुरु ! दया करो और मुझे मेरे प्रियतम प्राण हरि से मिला दो।

3मैं दासी बनकर गुरु-चरणों में लग गई हूँ, जिसने मुझे प्रभु मिलन का मार्ग दिखाया है॥ १॥

4हे राम ! हरि का नाम ही मेरे मन को भा गया है।

5हरि के बिना मेरा अन्य कोई साथी नहीं है और वही मेरा पिता, मेरी माता एवं सच्चा साथी है॥ १॥ रहाउ ॥

6हे मेरी माता ! अपने प्रियतम के दर्शनों के बिना मैं एक क्षण भर भी जीवित नहीं रह सकती और उसके बिना मेरे प्राण ही निकल जाते हैं।

7वे मनुष्य भाग्यशाली एवं धन्य हैं, जो गुरु की शरण में आए हैं और गुरु से मिलकर प्रभु दर्शन प्राप्त कर लिए हैं।॥ २॥

8मुझे अन्य कुछ भी नहीं सूझता और मन तो गुरु का जपाया हरि नाम का जाप ही जपता रहता है।

9नामहीन द्वार-द्वार फिरने वाले नकटे अर्थात् बेशर्म हैं और उन्होंने रगड़-रगड़ कर अपना नाक कटवा लिया है॥ ३॥

10हे जगत्पालक स्वामी ! मेरे हृदय में नाम बसाकर जीवित कर लो।

11हे नानक ! मेरा गुरु पूर्ण है, सतगुरु से मिलकर ही नाम का ध्यान किया है॥ ४॥ ५॥

12रामकली महला ४ ॥

13सतगुरु बड़ा दाता एवं महापुरुष है, जिसे मिलकर हरि को हृदय में बसाया जा सकता है।

14पूर्ण गुरु ने मुझे जीवनदान दिया है और हरि के नामामृत का चिंतन करता रहता हूँ॥ १॥

15हे राम ! गुरु ने हरि-नाम मेरे कंठ में बसा दिया है।

16मैं बड़ा भाग्यशाली एवं धन्य-धन्य हूँ जो गुरु के मुख से हरि-कथा सुनी है और वही मेरे मन को भा गई है॥ १॥ रहाउ॥

17तेंतीस करोड़ देवता भी परमात्मा का ध्यान करते हैं लेकिन उन्होंने भी उसका अन्त प्राप्त नहीं किया।

18वे अपने हृदय में काम के वशीभूत होकर नारी की कामना करते हैं और हाथ फैलाकर ऋद्धियाँ मांगते हैं।॥ २॥

19हरि-यश का जाप करो, सब धर्म कर्मों से यही सर्वश्रेष्ठ है तथा गुरुमुख बनकर इसे हृदय में धारण करके रखो।

20यदि उत्तम भाग्य हों तो हरि का जाप किया जा सकता है, जो भवसागर से पार उतार देता है॥ ३॥

21भगवान अपने भक्तों के निकट बसता है और भक्त उसके निकट बसते हैं, वह अपने भक्तों को गले से लगाकर रखता है।

22हे नानक ! प्रभु ही हमारी माता एवं पिता है, हम उसकी संतान हैं और वही हमारा पोषण करता है॥ ४॥ ६॥ १८ ॥

23रागु रामकली महला ५ घरु १

24ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

25हे दीनों के दाता ! कृपा करो, मेरे गुण अवगुण पर कोई विचार मत करो।

26हे स्वामी ! मिट्टी को धोने से कोई लाभ नहीं, मनुष्य की हालत भी यही है॥ १॥

27हे मेरे मन ! सतगुरु की सेवा करने से ही सुख हासिल होता है,

28जैसी कामना होगी, वृही फल मिलेगा और फिर से कोई दुख नहीं ! लगेगा।॥१ ॥ रहाउ ॥

29परमात्मा ने मानव-शरीर रूपी कच्चे बर्तन बनाकर उपकार किया है और उनके अन्तर्मन में उसकी ही ज्योति समाई हुई है।

30विधाता ने जैसा हमारा भाग्य लिख दिया है हम वैसा ही कर्म करते हैं।॥ २॥

31किन्तु जीव ने तन-मन को अपना समझ लिया है, यही जन्म-मरण का कारण है।

32जिसने इतना सुन्दर जीवन दिया है, यह परमेश्वर याद ही नहीं आता, अन्धा इन्सान मोह में ही फंसा हुआ है।॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं