गुरु ग्रंथ साहिब 881 · Raag Raamkalee · Guru Raam Daas Ji
1राम के भक्त गुरु मतानुसार राम नाम ही जपते हैं।
2जो भी राम का नाम सुनता एवं जपता है, वह संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है और वह राम का नाम जपता ही सुन्दर लगता है॥ १॥ रहाउ॥
3यदि माथे पर बड़े भाग्य उज्ज्वल हों तो प्रभु भक्तजनों से भेंट करवा देता है।
4यदि कृपा करके संत अपने दर्शन दें तो सब दुख-दारिद्र दूर हो जाते हैं।॥ २॥
5भगवान् के भक्तजन बड़े नेक व उपकारी हैं किन्तु भाग्यहीन निंदकों को वे नहीं लगते।
6भक्तजन जैसे-जैसे उच्च स्वर से राम नाम उच्चरित करते हैं, उतना ही सर्पदंश की तरह नाम निंदकों को पीड़ित करता है।॥ ३॥
7निंदक व्यक्ति धिक्कार योग्य हैं, जिन्हें संतजन भले नहीं लगते जो हरि के मित्र एवं साथी हैं।
8जिन्हें गुरु का मान-सम्मान नहीं भाता, वे विमुख, तिरस्कृत एवं हरि के चोर हैं।॥ ४ ।
9हे श्री हरि ! हम दीन तेरी शरण में आए हैं, दया करके हमारी रक्षा करो।
10नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तुम हमारे पिता हो और हम तेरी संतान हैं, क्षमा करके अपने साथ मिला लो ॥ ५ ॥ २ ॥
11रामकली महला ४ ॥
12हरि के सखा साधुजन बड़े नेक हैं और उन पर प्रभु अपनी कृपा का हाथ रखता है।
13गुरुमुख साधुजन ही प्रभु को भाते हैं और वह उन्हें कृपा करके अपने साथ मिला लेता है॥ १॥
14हे राम ! मुझे भक्तों से मिला दो, क्योंकि वही मेरे मन को भाते हैं।
15हरि रस अमृत के समान बड़ा मीठा है और संतजनों से मिलकर ही मुख में डाला जा सकता है॥ १॥ रहाउ ॥
16भगवान के भक्तजन बड़े उत्तम हैं, जिन्हें मिलकर उत्तम पदवी प्राप्त होती है।
17यदि मेरा ठाकुर मुझ पर प्रसन्न हो जाए तो मैं उसके दासों के दास की सेविका बन जाऊँ॥ २॥
18ये भक्तजन बड़े भाग्यशाली हैं, जो प्रभु की उपासना करते हैं और उनके मन-तन-हृदय में प्रभु से प्रीति लगी रहती है।
19जो व्यक्ति प्रीति के बिना ही बहुत बातें करता है, वह झूठ बोलकर झूठा फल ही हासिल करता है॥ ३॥
20हे जग के जीवनदाता ! मुझ पर कृपा करो, ताकि संतों के चरणों में आश्रय प्राप्त हो जाए।
21हे नानक ! मैं अपना सिर काट-काट कर मार्ग में रख दूंगा ताकेि संत उस पर चढ़कर मेरे पास आएँ॥ ४॥ ३॥
22रामकली महला ४ ॥
23यदि मेरे बड़े भाग्य हों तो भक्तजनों को मिलने में कोई विलम्ब नहीं करना चाहिए।
24भक्तजन अमृत का कुण्ड एवं पावन सरोवर हैं और उन में उत्तम भाग्य से ही स्नान किया जाता है॥ १॥
25हे राम ! मुझे भक्तजनों की सेवा में लगाओ ताकि
26उन संतों की पानी, पंखा, आटा पीसने की सेवा करूँ और उनके पैर मल-मल कर धोकर उनकी चरण-धूलि मुंह में लगाऊँ॥ १॥ रहाउ॥
27भक्तजन बड़े परोपकारी एवं महान होते हैं, जो सतगुरु से संपर्क करवा देते हैं।
28सतगुरु जैसा महान् अन्य कोई नहीं है और सतगुरु से मिलकर ही परमात्मा का ध्यान हो सकता है॥ २॥
29जो व्यक्ति सतगुरु की शरण में पड़े हैं, उन्होंने परम सत्य को पा लिया है और मेरे ठाकुर ने उनकी लाज रख ली है।
30कुछ व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए गुरु के आगे बैठ जाते हैं और बगुले की तरह समाधि लगा लेते हैं।॥ ३॥
31बगुले एवं कौए जैसे नीचों की संगति में जाकर गंदगी में ही मुँह लगाना पड़ता है।
32नानक प्रार्थना करते हैं केि हे प्रभु ! मुझे गुरु की संगति में मिला दो ताकि गुरु मुझे बगुले से हंस बना दे ॥ ४॥ ४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं