सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 87 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1गुरु की मति पर अनुसरण करने से मृत्यु उन्हें देख भी नहीं सकती; वे सत्य-प्रभु के नाम में ही मग्न रहते हैं।

2सृष्टिकर्ता स्वयं सब में मौजूद हो रहा है; जो उसे अच्छा लगता है, उसे वह अपने नाम-सिमरन में लगा देता है।

3यदि नानक भगवान का नाम-सिमरन करता रहता है तो ही वह जीवित रहता है; नाम के बिना तो वह एक क्षण में ही मर जाता है ॥२॥

4पउड़ी ॥

5जो प्रभु के दरबार में सम्मानित होता है, वह संसार की समस्त सभाओं के भीतर सम्मानित होता है।

6जहाँ कहीं भी वह जाता है, उधर ही वह प्रफुल्लित हो जाता है; उसका चेहरा देखने से सारे दोषी पार हो जाते है।

7उसके भीतर नाम का अमूल्य भण्डार है और हरि के नाम द्वारा ही वह स्वीकृत होता है।

8नाम की वह पूजा करता है, नाम पर ही उसका निश्चय है और हरिनाम ही उसके समस्त पापों को नष्ट करता है।

9जो प्राणी प्रभु के नाम का, एक मन व एक चित से सिमरन करते हैं, वह इस संसार के अन्दर अमर रहते हैं ॥११॥

10श्लोक महला ३॥

11सहज अवस्था में गुरु की आज्ञानुसार परमात्मा की पूजा करो।

12जब जीवात्मा की परमात्मा में आस्था हो जाती है तो जीवात्मा का अपने हृदय-घर में ही भगवान से प्रेम हो जाता है।

13गुरु के आचरण में रहकर जीवात्मा अटल हो जाती है और वह कहीं भी डगमगाती नहीं।

14गुरु के बिना सहज सुख उपलब्ध नहीं होता और मन में से लालच की मलिनता दूर नहीं होती।

15यदि हरि का नाम एक पल व क्षण भर के लिए चित्त में वास कर जाए तो अठसठ तीर्थों के स्नान का फल मिल जाता है।

16पवित्रात्मा को कभी माया की मैल नहीं लगती परन्तु जो द्वैतभाव में लगते है यह मैल उन्हें लगती है।

17चाहे मनुष्य अठसठ तीर्थस्थलों पर स्नान कर ले, यह मैल धोने से बिल्कुल दूर नहीं होती।

18मनमुख व्यक्ति अहंकार में धर्म-कर्म करता है और वह सदैव दुःखों का बोझ वहन करता है।

19हे नानक ! मैला मन तभी पवित्र होता है, यदि वह सतिगुरु में लीन हुआ रहे ॥१॥

20महला ३॥

21यदि मनमुख व्यक्ति को समझाने का प्रयास भी किया जाए तो वे समझाने से भी कभी नहीं समझते।

22ऐसे मनमुख प्राणियों को यदि गुरमुखों के साथ मिलाने का प्रयास करें तो भी कर्म-बन्धनों के कारण आवागमन में भटकते रहते हैं।

23प्रभु की प्रीति व माया की लगन दो मार्ग हैं, मनुष्य कौन-सा कर्म करता है अर्थात् किस मार्ग चलता है, वह प्रभु की इच्छा पर निर्भर है।

24गुरुवाणी की कसौटी का अभ्यास करने से गुरमुख ने अपने मन को वश में कर लिया है।

25अपने मन के साथ वह विवाद करता है, मन के साथ ही वह सुलह की बात करता है और मन के साथ ही वह संघर्ष के लिए जुटता है।

26सच्ची गुरुवाणी की प्रीति से मनुष्य सब कुछ पा लेता है जो कुछ वह चाहता है।

27वह हमेशा अमृत नाम का पान करता है और गुरु के उपदेशानुसार कर्म करता है।

28जो अपने मन के अलावा किसी अन्य के साथ झगड़ा करता है, वह अपना जीवन व्यर्थ ही गंवा कर चला जाएगा।

29मन के हठ और झूठ तथा मिथ्या कुत्सा के कर्म द्वारा मनमुख प्राणी जीवन का खेल हार जाते हैं।

30विवेकशील गुरमुख गुरु की दया से अपने मंदे-अहंकार पर विजय पा लेता है और उसकी प्रीति हरि के साथ लग जाती है।

31हे नानक ! गुरमुख सत्य नाम की कमाई करता है और मनमुख प्राणी आवागमन के चक्र में फँसा रहता है ॥२॥

32पउड़ी॥

33हे भगवान के संतजनों, भाइयों ! भगवान रूप सतिगुरु की एक कथा सुनो।

34जिस व्यक्ति के माथे पर प्रारम्भ से ही उसकी किस्मत में लिखा होता है, वहीं इस कथा को सुनकर अपने हृदय में बसाता है।

35भगवान की अमृत कथा सर्वोत्तम एवं श्रेष्ठ है; गुरु की वाणी द्वारा सहज ही इसका स्वाद प्राप्त होता है।

36उनके ह्रदय में प्रभु की ज्योति का प्रकाश हो जाता है; उसके ह्रदय में से अज्ञान रूपी अँधेरा यूं मिट जाता है जैसे सूर्य रात्रि के अन्धेरे को नाश कर देता है।

37गुरमुख अपने नेत्रों से उस अदृष्ट, अगोचर, अलक्ष्य परमेश्वर के साक्षात् दर्शन कर लेता है॥ १२॥

38श्लोक महला ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं