गुरु ग्रंथ साहिब 877 · Raag Raamkalee · Guru Nanak Dev Ji
1फिर जहाँ भी दृष्टि जाती है, उधर ही भगवान समाया हुआ लगता है।३॥
2जिसके अन्तर्मन में सन्देह होता है तो बाहर से माया के तीर उसकी आँखों पर लगते हैं।
3गुरु नानक विनय करते हैं कि हे प्राणी ! तू परमात्मा के दासों का दास बन जा, अन्यथा बहुत दुखी होगा ॥ ४॥ २ ॥
4रामकली महला १ ॥
5शरीर के जिस द्वार में भगवान का निवास है, उसे कौन-सा द्वार कहा जाता है ? शरीर के दस द्वारों में से उस गुप्त द्वार को कौन ढूंढ सकता है?
6कोई आकर मुझे वह द्वार बताए जिस द्वार को ढूंढने के लिए मैं चिरकाल उदास हुआ फिरता हूँ॥ १॥
7इस संसार-सागर में से किस विधि द्वारा पार हुआ जा सकता है ?
8(गुरु जी उत्तर देते हैं केि) जीवन्मुक्त होने से ही जीव का उद्धार हो सकता है॥ १॥ रहाउ॥
9शरीर रूपी घर का दरवाजा दुख है और क्रोध उसका रखवाला है। उस दरवाजे को आशा एवं सन्देह के दो तख्ते लगे हुए हैं।
10उस स्थान के इर्द-गिर्द माया रूपी खाई है जिसमें विषय-विकार रूपी पानी भरा हुआ है, जीव ने उस स्थान पर अपना घर बनाया हुआ है। सत्य के आसन पर परमात्मा विराजमान है॥ २॥
11हे परमेश्वर ! तेरे कितने ही नाम हैं और किसी ने भी तेरा अंत नहीं जाना, तुझ जैसा अन्य कोई नहीं है।
12ऊँचा नहीं बोलना चाहिए, अपितु मन में स्थिर रहना चाहिए। वह स्वयं ही सबकुछ जानता है और स्वयं ही सबकुछ करता है॥ ३॥
13जब तक मन में आशा एवं सन्देह है, तब तक वह कैसे एक परमात्मा का स्मरण कर सकता है ?
14हे नानक ! परमेश्वर तभी मिल सकता है, यदि जीव आशाओं में रहता हुआ आशाओं से निर्लिप्त रहे॥ ४॥
15हे जीव ! इस विधि द्वारा संसार सागर से पार हुआ जा सकता है और
16जीवन्मुक्त हुआ जा सकता है॥ १॥ रहाउ दूसरा ॥ ३॥
17रामकली महला १ ॥
18अनहद शब्द की ध्वनि को सुरति द्वारा सुनना ही मेरी सिंगी है, जब अनहद शब्द बजता है तो इसे सभी लोग सुनते हैं।
19नाम मॉगने के लिए स्वयं को योग्य बनाना ही मेरी झोली है,जिस में नाम रूपी भिक्षा डाली जाती है।१॥
20हे बाबा ! गोरख सदैव जाग्रत है।
21गोरख वही (परमेश्वर) है, जिसने पृथ्वी को उठाकर उसकी रक्षा की थी और ऐसा करते देरी नहीं लगी ॥ १॥रहाउ॥
22परमात्मा ने पवन-पानी इत्यादि पाँच तत्वों द्वारा प्राणों को बाँधकर रखा हुआ है और संसार में उजाला करने के लिए सूर्य एवं चन्द्रमा दो दीपक प्रज्वलित किए हुए हैं।
23उसने मरने एवं जीने के लिए जीवों को धरती दी हुई है लेकिन जीव को उसके इतने सब उपकार भूल गए हैं।॥ २॥
24संसार में सिद्ध-साधक, योगी, जंगम एवं अनेक पीर-पैगम्बर हैं,
25यदि उनसे मेरी मुलाकात हो तो भी परमात्मा की स्तुति करता हूँ और मेरा मन प्रभु की सेवा करे॥ ३॥
26जैसे कागज एवं नमक घी के साथ सुरक्षित रहते हैं (अर्थात् खराब नहीं होते) और कमल का फूल जल में खिला रहता है,
27हे नानक ! वैसे ही जिन्हें ऐसे भक्त मिल जाते हैं, यम उनका क्या बिगाड़ सकता है। ॥४ ॥ ४ ॥
28रामकली महला १ ॥
29गुरु नानक देव जी कहते हैं कि हे मच्छन्दर नाथ ! जरा ध्यान से सुन;
30जो व्यक्ति कामादिक पाँच विकारों को वशीभूत कर लेता है, वह कभी पथभ्रष्ट नहीं होता।
31जो ऐसी योग युक्ति की साधना करता है,
32वह स्वयं तो भवसागर से पार होता ही है, उसकी सारी कुल का भी उद्धार हो जाता है॥ १॥
33सच्चा अवधूत वही है, जो ऐसी मति प्राप्त कर लेता है और
34रात-दिन शून्य समाधि में ही विलीन रहता है॥ १॥ रहाउ॥
35ऐसा व्यक्ति भक्ति की भिक्षा मांगता और प्रभु-भय में ही जीवन व्यतीत करता है।
36इस तरह उसे अमूल्य संतोष हासिल हो जाता है, जिससे वह तृप्त रहता है।
37सिद्धों के आसन के स्थान पर वह ध्यान रूपी आसन लगाता है और
38अपने चित्त में सत्य-नाम की समाधि लगाकर रखता है॥ २॥
39नानक तो अमृत-वाणी बोलता है।
40हे मच्छन्दर नाथ ! सच्चे अवधूत की निशानी सुन;
41वह अभिलाषा वाले जगत् में रहता हुआ विरक्त जीवन व्यतीत करता है।
42हे नानक ! ऐसा अवधूत निश्चय ईश्वर को पा लेता है॥ ३॥
43नानक विनती करते हैं कि हे मच्छन्दर नाथ ! तुम्हें रहस्य की बात सुनाता हूँ।
44वह अपने गुरु की शिक्षा द्वारा अपने शिष्यों का भी परमात्मा से मिलाप करवा देता है।
45वह गुरु की दीक्षा रूपी औषधि एवं भोजन खाता रहता है और
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं