गुरु ग्रंथ साहिब 875 · Raag Gond · Bhagat Naam Dev Ji
1हे पांडे ! तुम्हारे (कथनानुसार) रामचंद्र का भी बहुत नाम सुना,
2उनकी लंका नरेश रावण के साथ लड़ाई हुई और तदुपरांत उन्होंने पत्नी सीता गंवा दी थी।॥ ३॥
3हिन्दू अन्धा है और तुर्क काना है,
4मगर इन दोनों से ज्ञानी चतुर है।
5हिन्दू मन्दिर में पूजा करता है और मुसलमान मस्जिद में सिजदा करता है।
6नामदेव ने तो उस परमात्मा का ही सिमरन किया है, जो मन्दिर अथवा मस्जिद में नहीं है।४ ॥ ३ ॥ ७ ॥
7रागु गोंड बाणी रविदास जीउ की घरु २
8ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
9हे संसार के लोगो ! ईश्वर का जाप करो,
10उसका सिमरन किए बिना यह तन व्यर्थ ही चला जाता है।
11ईश्वर ही मुक्ति का दाता है और
12हमारा माता-पिता भी वही है॥ १॥
13जिसका जीना-मरना सब भगवान पर है,
14उसके सेवक को सदा आनंद बना रहता है।१॥ रहाउ ॥
15ईश्वर की उपासना ही हमारे प्राणों का आधार है।
16उसका जाप करने से मस्तक पर मुक्ति का चिन्ह पड़ जाता है।
17कोई वैरागी ही मुकुन्द की अर्चना करता है।
18मुझ जैसे दुर्बल को भी मुकुन्द नाम रूपी धन हासिल हो गया है॥ २ ॥
19जब एक परमेश्वर स्वयं मुझ पर उपकार करता है तो
20यह संसार मेरा क्या बेिगाड़ सकता है।
21उसकी भक्ति ने मेरी नीच जाति को मिटाकर अपने द्वार का दरबारी नियुक्त कर दिया है।
22हे मुकुन्द ! एक तू ही युगों-युगांतरों से पार करवाने में समर्थ है॥ ३॥
23मेरे मन में ज्ञान उत्पन्न होने से प्रकाश हो गया है।
24उसने कृपा करके मुझ जैसे तुच्छ जीव को अपना दास बना लिया है।
25रविदास जी कहते हैं कि अब मेरी तृष्णा बुझ गई है,
26मुकुन्द को जप कर उसकी सेवा में ही लीन रहता हूँ॥ ४॥ १॥
27गोंड ॥
28यदि कोई अड़सठ तीर्थों पर स्नान करे,
29यदि वह (अमरनाथ, सोमनाथ, काशी, रामेश्वरम, केदारनाथ इत्यादि) बारह शिवलिंगों की पूजा भी करे,
30यदि वह कुआं एवं तालाब बनाकर जनहित के लिए अर्पण भी कर दे,
31किन्तु यदि वह (साधु की) निंदा करता है तो उसका सारा पुण्य व्यर्थ ही जाता है॥ १॥
32साधु की निंदा करने वाला कैसे मोक्ष प्राप्त कर सकता है ?
33सत्य जानो वह अवश्य ही नरक में पड़ता है।॥ १॥ रहाउ॥
34यदि कोई सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र तीर्थ पर जाकर स्नान करे,
35वहाँ अपनी नारी को सोलह श्रृंगार सहित ब्राह्मणों को दान के रूप में अर्पित कर दे,
36यदि वह समस्त स्मृतियों को अपने कानों से सुने,
37यद्यपि वह साधु की निंदा कर दे तो उसके किए पुण्य-कर्मों का उसे कोई फल नहीं मिलता ॥ २॥
38यदि कोई अनेक बार ब्रह्म-भोज का आयोजन कर साधुओं अथवा लोगों को भोजन करवाता है,
39यदि वह जनहित के लिए भूमिदान करता, सुन्दर महल एवं धर्मशाला बनवाता है,
40यदि वह अपना कार्य बिगाड़ कर दूसरों का कार्य संवार देता है लेकिन
41यदि वह (संत की) निंदा कर दे तो उसे अनेक योनियों में भटकना पड़ता है।॥ ३ ॥
42हे संसार के लोगो ! आप निंदा क्यों करते हो ?
43निंदक की मक्कारी की दुकान प्रगट हो जाती है अर्थात् उसका पोल खुल जाता है।
44रविदास जी कहते हैं कि मैंने भलीभांति जॉच-पड़ताल करके निंदक के बारे में यही विचार किया है कि
45ऐसा पापी इन्सान आखिरकार नरक में ही पड़ा है॥ ४॥ २॥ ११॥ ७ ॥ २ ॥ ४९ ॥ जोड़॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं