सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 86 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1जिस व्यक्ति ने गुरु की मति द्वारा अपने स्वरूप को पहचान लिया है, उसके हृदय में प्रभु नाम का प्रकाश हो जाता है।

2जो व्यक्ति सत्य-नाम का सिमरन करते हैं, उन्हें भगवान से बड़ी शोभा मिलती है।

3मैं उस भगवान की महिमा करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि हे प्रभु ! मेरे प्राण एवं मेरा शरीर यह सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है।

4यदि सत्य प्रभु की महिमा नाम द्वारा की जाए तो मनुष्य अनंत सुख भोगता है।

5मन द्वारा भगवान की महिमा करनी ही जप, तप एवं संयम है। नामविहीन मनुष्य का जीवन धिक्कार योग्य है।

6नाम गुरु की मति द्वारा ही मिलता है। माया के मोह में फँसकर मनमुख व्यक्ति का विनाश हो जाता है।

7हे जगत् के स्वामी ! जिस तरह तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही मेरी रक्षा करो, नानक तेरा सेवक है ॥ २ ॥

8पउड़ी॥

9हे प्रभु ! सारे प्राणी तेरी संतान हैं और तुम सबके पिता हो। तुम हरेक प्राणी की पूँजी हो।

10सभी जीव प्रार्थना करके हमेशा तुझसे माँगते रहते हैं।

11हे प्रभु ! जिस किसी को भी तुम देते हो, वह सब कुछ पा लेता है। कई जीवों को तू कहीं दूर ही निवास करता लगता है और कई तुझे अपने पास ही निवास करते समझते हैं।

12तेरे अलावा कोई स्थान नहीं जिससे माँगा जाए। अपने मन में इसका निर्णय करके देख ले।

13हे प्रभु ! सभी तेरी उपमा करते हैं, गुरमुखों को तेरे दरबार पर तेरे प्रकाश के दर्शन होते हैं ॥९॥

14श्लोक महला ३॥

15पण्डित ग्रंथ पढ़-पढ़कर उच्च स्वर में लोगों को सुनाता है। उसे तो माया-मोह से ही प्रेम है।

16वह मूर्ख एवं गंवार है जो अपने हृदय में विद्यमान परमात्मा को नहीं पहचानता।

17वह माया-मोह में मुग्ध हुआ जगत् के लोगों को उपदेश देता है और ज्ञान को नहीं समझता।

18उसने अपना जन्म व्यर्थ गंवा दिया है और वह बार-बार जन्मता एवं मरता रहता है ॥१॥

19महला ३॥

20विचार करके यह बात समझ लो कि जिन्होंने सतिगुरु की सेवा की है, उन्होंने ईश्वर के नाम को प्राप्त किया है।

21उनके चित्त में सदैव सुख-शांति का निवास होता है और उनके दुःख, विलाप-शिकायत नष्ट हो जाते हैं।

22जब मन गुरु के शब्द को विचार कर अपने अहंत्व को स्वयं ही नष्ट कर देता है तो वह निर्मल हो जाता है।

23हे नानक ! जो प्राणी हरिनाम में लीन रहते हैं, वे मोक्ष प्राप्त करते हैं और भगवान से उनका प्रेम हो जाता है ॥२॥

24पउड़ी ॥

25हरि की सेवा तभी सफल होती है, जब वह गुरु द्वारा इसे स्वीकृत करता है।

26जिस पर प्रभु प्रसन्न होता है, उसको गुरु जी मिल जाते हैं, केवल वही हरिनाम का ध्यान करता है।

27गुरु की वाणी द्वारा वह प्रभु को पा लेता है। फिर भगवान उसे भवसागर से पार कर देता है।

28मन के हठ से किसी को भी ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ। चाहे वेदों-शास्त्रों का मनन करके देख लो।

29हे नानक ! वही प्राणी ईश्वर की भक्ति करता है, जिसको भगवान अपने साथ मिला लेता है ॥१०॥

30श्लोक महला ३॥

31हे नानक ! वही व्यक्ति शूरवीर एवं महान योद्धा है, जिसने अपने अन्तर्मन से दुष्ट अहंकार का नाश कर लिया है।

32उसने गुरु के माध्यम से नाम की महिमा करके अपना जन्म संवार लिया है।

33वह स्वयं सदैव के लिए मुक्त हो जाता है तथा अपने समूचे वंश को भी भवसागर से बचा लेता है।

34वह सत्य प्रभु के दरबार पर बड़ी शोभा प्राप्त करता है और उसे प्रभु का नाम ही प्रिय लगता है।

35मनमुख प्राणी अहंकार में मरते हैं और अपनी मृत्यु को भी दुःखदायक बना लेते हैं।

36सब ओर ईश्वर का आदेश चलता है। बेचारे प्राणी क्या कर सकते हैं?

37उन्होंने स्वयं ही माया के प्रेम में लगकर प्रभु को विस्मृत कर दिया है।

38हे नानक ! नाम से विहीन होने के कारण उन्हें दुःख आकर लग जाते हैं तथा सुख तो उन्हें भूल ही जाता है। ॥१॥

39महला ३॥

40जिन्हें पूर्ण गुरु ने भगवान का नाम दृढ़ करवा दिया है; उन्होंने अपने अन्तर्मन में से भ्रम को दूर कर लिया है।

41वह राम नाम द्वारा भगवान की महिमा-स्तुति करते है; भगवान ने उनके अन्तर्मन में अपनी ज्योति का प्रकाश करके उन्हें भक्ति-मार्ग दिखा दिया है।

42उन्होंने अपने अहंकार को नष्ट करके एक प्रभु में सुरति लगाई है; जिससे उनके अन्तरमन में भगवान के नाम निवास हो गया है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं