सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 868 · Raag Gond · Guru Arjan Dev Ji

1सब जीवों में नारायण का ही निवास है और

2हरेक शरीर में उसकी ज्योति का प्रकाश हो रहा है।

3नारायण का नाम जपने वाला कभी नरक में नहीं जाता,

4उसकी उपासना करने से सब फल प्राप्त हो जाते हैं ॥ १॥

5मेरे मन में नारायण के नाम का ही आसरा है और

6संसार-सागर से पार करवाने के लिए वही जहाज है।

7नारायण जपने से यम भागकर दूर चला जाता है और

8वही माया रूपी डायन के दाँत तोड़ने वाला है।॥ २॥

9नारायण सदैव क्षमावान् है और

10उसने भक्तो के हृदय में सुख एवं आनंद पैदा कर दिया है।

11समूचे संसार में उसका ही प्रताप फैला हुआ है और

12नारायण ही संतों का माई-बाप है।॥ ३॥

13संतों की संगति में हर समय 'नारायण-नारायण' शब्द का ही भजन गूंजता रहता है और

14वे बारम्बार नारायण के ही गुण गाते रहते हैं।

15गुरु से मिलकर अगोचर वस्तु प्राप्त कर ली है,

16दास नानक ने भी नारायण की शरण ले ली है॥ ४॥ १७ ॥ १६ ॥

17गोंड महला ५ ॥

18जिसकी रक्षा सर्वशक्तिमान निरंकार करता है,

19उसका ही वह साथ देता है॥ १॥ रहाउ ॥

20माता के गर्भ में जठराग्नि भी उस जीव को स्पर्श नहीं करती और

21काम, क्रोध, लोभ एवं मोह भी तंग नहीं करते।

22साधु की संगति में वह निरंकार का नाम जपता रहता है और

23उसकी निंदा करने वाले के मुंह में राख ही पड़ती है ॥ १॥

24राम का नाम ही दास का कवच एवं ढाल है,

25जिसे कामादिक दुष्ट दूत स्पर्श नहीं करते।

26जो भी व्यक्ति घमण्ड करता है, उसका नाश हो जाता है।

27प्रभु की शरण ही विनम्र दास का सहारा है॥ २॥

28जो जो जीव भगवान की शरण में आया है,

29उस दास को प्रभु ने अपने गले से लगा लिया है।

30यदि कोई बहुत अहंकार करता है तो

31वह क्षण में ही खाक में मिल जाता है ॥ ३॥

32ईश्वर ही सत्य है, वह वर्तमान में भी है और भविष्य में भी वही होगा।

33मैं सदैव उस पर बलिहारी जाता हैं,

34वह अपनी कृपा करके दास की रक्षा करता है।

35केवल प्रभु ही नानक के प्राणों का आधार है॥ ४॥ १८॥ २०॥

36गोंड महला ५ ॥

37यह अद्भुत कथा बड़ी अनुपम है कि आत्मा ही परमात्मा का रूप है। रहाउ॥

38यह (आत्मा) न ही बूढ़ा होता है और न ही जवान होता है।

39न इसे कोई दुख छूता है और न ही इसे यम का जाल फँसाता है।

40न ही इसका कभी नाश होता है और न ही यह जन्मता हैं।

41यह तो युगों-युगान्तरों में हमेशा स्थित रहता है ॥ १॥

42न ही इसे गर्मी प्रभावित करती है और न ही सदी का कोई प्रभाव पड़ता है।

43न इसका कोई दुश्मन हैं और न ही कोई मित्र है।

44न इसे कोई खुशी है और न ही कोई गम है।

45यह सबकुछ इसका ही है और यह सबकुछ करने में योग्य है॥ ३॥

46न इसका कोई बाप है और न ही इसकी कोई माँ है।

47यह अपरम्पार है और सदा ही होता आया है।

48पाप एवं पुण्य का इसे कोई लेप नहीं लगता।

49यह घट-घट सबके अंतर में सदैव ही जाग्रत है ॥ ३॥

50उसने तीन गुणों वाली शक्ति अर्थात् माया को पैदा किया है और

51यह महामाया उसकी ही छाया है।

52परमात्मा बड़ा दयालु, अछल, अछेद एवं अभेद है।

53यह दीनदयाल सदैव कृपा का घर है।

54उसकी गति एवं अनुमान लगाया नहीं जा सकता।

55नानक सदैव उस पर बलिहारी जाता है ॥ ४ ॥ १६ ॥ २१॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं