गुरु ग्रंथ साहिब 866 · Raag Gond · Guru Arjan Dev Ji
1गुरु के चरण-कमल को नमन करो;
2इस प्रकार इस तन में से काम-क्रोध को मार दो।
3हमें सबके चरणों की धूलि बनकर रहना चाहिए और
4सबमें बस रहे राम को पहचानना चाहिए॥ १॥
5इस विधि द्वारा गोपाल गोविंद को याद करते रहो,
6यह तन-धन सब प्रभु का दिया हुआ है और अमूल्य जिंदगी भी उसकी देन है॥ १॥ रहाउ॥
7आठ प्रहर भगवान का गुणगान करो;
8तेरी जिंदगी एवं प्राणों का यही मनोरथ है,
9अपना अभिमान त्यागकर प्रभु को साथ ही समझो।
10साधु की कृपा से मन भगवान् के रंग में लगाओ॥ २॥
11जिस परमात्मा ने तुझे पैदा किया है, उसे समझ लो।
12आगे उसके दरबार में बड़ा यश प्राप्त होगा।
13जिस व्यक्ति की रसना ईश्वर का नाम जपती रहती है,
14उसका मन-तन निर्मल हो जाता है और वह निहाल हो जाता है।॥ ३॥
15हे दीनदयाल ! मुझ पर कृपा करो;
16मेरा मन तो साधु की चरण-धूलि ही मांगता है।
17हे प्रभु ! दयालु होकर मुझे यह दान दीजिए।
18क्योंकि नानक तो प्रभु का नाम जपकर ही जीवित रह रहा है॥ ४॥ ११॥ १३॥
19गोंड महला ५ ॥
20परमात्मा की उपासना ही मेरे लिए वास्तव में धूप एवं दीप की तरह अर्चना करना है और
21अनेक वार करतार की ही वन्दना करता हूँ।
22सबकुछ त्याग कर मैंने प्रभु की शरण ग्रहण कर ली है और
23मैं बड़ा भाग्यशाली हैं कि गुरु मुझ पर सुप्रसन्न हो गया है॥ १॥
24आठ प्रहर गोविंद का यशोगान करना चाहिए।
25यह तन-धन प्रभु का दिया हुआ है और प्राण भी उसकी ही देन है ॥ १॥ रहाउ॥
26भगवान का गुणगान करने से मन में आनंद बना रहता है।
27परब्रह्म क्षमावान् एवं कृपा का घर है और
28कृपा करके उसने भक्तजनों को अपनी सेवा में लगा लिया है।
29उसने जन्म-मरण के दुखः मिटाकर अपने साथ मिला लिया है॥ २ ॥
30कर्म धर्म एवं सच्चा ज्ञान तो यही है कि
31सत्संग में मिलकर हरि का नाम जपना चाहिए।
32प्रभु के चरण ऐसा जहाज है जो संसार-सागर से पार करवा देता है।
33अन्तर्यामी प्रभु ही सब करने एवं कराने वाला है ॥३॥
34उसने अपनी कृपा करके बचा लिया है और
35भयानक पाँच दूतों-काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार को भगा दिया है।
36अब वह कभी भी जुए में जन्म नहीं हारेगा,
37क्योकि ईश्वर ने स्वयं नानक का पक्ष लिया है ॥ ४॥ १२॥ १४॥
38गोंड महला ५ ॥
39परमात्मा ने कृपा करके मन में सुख एवं आनंद कर दिया है।
40गुरुदेव ने अपने बालक को बचा लिया है।
41प्रभु कृपा का घर एवं दया का सागर है,
42वह सब जीवों को क्षमा करने वाला है॥ १॥
43हे दीनदयाल प्रभु ! तेरी शरण में आ गया हूँ।
44हे परब्रह्म ! तेरा नाम जपकर सदैव निहाल रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
45हे प्रभु ! तुझ जैसा दयालु अन्य कोई नहीं और
46घट घट सबके मन में तू ही समा रहा है।
47तू अपने दास का लोक-परलोक सवार देता है।
48हे प्रभु ! पतितों को पावन करना तुम्हारा यश है॥ २॥
49गोविंद का स्मरण ही करोड़ों रोगों की औषधि है और
50भगवान का भजन ही सर्वोत्तम तंत्र-मंत्र है।
51प्रभु का ध्यान करने से सब रोग-शोक मिट जाते हैं और
52मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं॥ ३॥
53दयावान् ईश्वर सबकुछ करने-कराने में समर्थ है और
54उसका चिंतन ही सर्व भण्डार है।
55हे नानक ! प्रभु ने स्वयं ही भक्तजनों को बचा लिया है,
56सदैव एक परमात्मा का जाप करो ॥ ४॥ १३ ॥ १५ ॥
57गोंड महला ५॥
58हे मेरे मित्र ! हरि नाम जपो;
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं