सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 864 · Raag Gond · Guru Arjan Dev Ji

1नानक तो दिन-रात नाम का ही मनन करता रहता है और

2हरि के नाम द्वारा उसके हृदय में सहज सुख एवं आनंद बना रहता है॥ ४॥ ४॥ ६॥

3गोंड महला ५ ॥

4गुरु की मूर्ति का ही मन में ध्यान लगा हुआ है और

5गुरु के शब्द को ही मन में मंत्र मान लिया है।

6गुरु के चरणों को हृदय में धारण कर लिया है,

7गुरु ही परब्रह्म है जिसे हमारा सदैव नमन है॥ १॥

8हे संसार के लोगो ! भ्रम में पड़कर भूल मत जाना, क्योंकि

9गुरु के बिना कोई भी संसार-सागर में से पार नहीं होता।॥ १॥ रहाउ॥

10भटके हुए जीव को गुरु ने ही सन्मार्ग प्रदान किया है और

11अन्य सब कुछ त्याग कर भगवान की भक्ति में लगाया है।

12उसने जन्म-मरण की सारी चिन्ता मिटा दी है

13पूर्ण गुरु की यह बेअंत बड़ाई है॥ २॥

14गुरु की कृपा से उलटा पड़ा हृदय कमल खिल गया है और

15अन्धेरे रूपी मन में प्रकाश हो गया है।

16जिस ईश्वर ने उत्पन्न किया है, उसे गुरु से ही जाना है।

17गुरु-कृपा से मूर्ख मन प्रसन्न हो गया है॥ ३॥

18गुरु ही कर्ता है और वही सब कुछ करने में समर्थ है।

19गुरु ही परमेश्वर है, वह वर्तमान में भी है और भविष्य में भी उसका ही अस्तित्व होगा।

20हे नानक ! प्रभु ने यह भेद बता दिया है कि

21गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिलती ॥ ४ ॥ ५ ॥ ७ ॥

22गोंड महला ५ ॥

23हे मेरे मन ! गुरु गुरु जपो,

24गुरु के बेिना मेरा अन्य कोई सहारा नहीं है।

25दिन-रात गुरु की शरण में रहो,

26जिसकी देन कोई नहीं मिटा सकता॥ १॥

27गुरु एवं परमेश्वर को एक ही समझो,

28जो उसे भाता है, वही मंजूर होता है।१॥ रहाउ॥

29जिसका मन गुरु-चरणों में लग जाता है,

30उसका दुख-दर्द एवं भ्रम दूर हो जाता है।

31गुरु की सेवा करने से बड़ा यश प्राप्त होता है,

32इसलिए मैं सदैव गुरु पर कुर्बान जाता हूँ॥ २॥

33गुरु का दर्शन करके मैं निहाल हो गया हूँ।

34गुरु के सेवक की साधना पूर्ण हो जाती है।

35गुरु के सेवक को कोई दुख नहीं लगता और

36गुरु का सेवक दसों दिशाओं में विख्यात हो जाता है।॥ ३॥

37गुरु की महिमा अकथनीय है,

38परब्रह्म गुरु हर जगह समाया हुआ है।

39हे नानक ! जिसके पूर्ण भाग्य होते हैं,

40उसका मन ही गुरु के चरणों में लगता है॥ ४ll ६॥ ८ ॥

41गोंड महला ५ ॥

42गुरु ही मेरी पूजा है, वही मेरा गोविन्द है।

43गुरु ही मेरा परब्रह्म एवं भगवंत है।

44गुरु मेरा पूज्य देवता है, वह अदृष्ट है और उसका रहस्य पाया नहीं जा सकता।

45जिसकी सभी पूजा करते हैं, मैं उस गुरु के चरणों की सेवा में ही लीन हूँ॥ १॥

46गुरु के बिना मेरा अन्य कोई स्थान नहीं है,

47मैं दिन-रात गुरु का नाम जपता रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥

48गुरु ही मेरा ज्ञान है और हृदय में गुरु का ही ध्यान करता हूँ।

49गुरु ही जगत का पालनहार एवं परमपुरुष भगवान है।

50मैं हाथ जोड़कर गुरु की शरण में पड़ा रहता हूँ,

51गुरु के बिना मेरा अन्य कोई साथी नहीं है॥ २॥

52गुरु ऐसा जहाज है जो जीव को भवसागर से पार करवा देता है।

53गुरु की सेवा करने से ही यम से छुटकारा मिलता है और

54अज्ञान रूपी अंधेरे में गुरु-मंत्र ही उजाला करता है।

55गुरु के संग रहने से सबका निस्तारा हो जाता है॥ ३॥

56बड़े भाग्य से ही पूर्ण गुरु मिलता है,

57गुरु की सेवा करने से कोई दुख स्पर्श नहीं करता

58गुरु के शब्द को कोई मिटा नहीं सकता

59गुरु ही नानक है और नानक ही परमेश्वर है ॥४॥७॥९॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं