गुरु ग्रंथ साहिब 862 · Raag Gond · Guru Raam Daas Ji
1हे मेरी सखियो ! आओ, मिलकर सतिगुरु की धीरज देने वाली मति लेकर मुझे मेरे प्रभु के गुण सुनाओ॥ ३॥
2हे हरि ! नानक की अभिलाषा पूरी करो, चूंकि तेरे दर्शन करके ही उसके शरीर को शान्ति मिलती है॥४॥६॥ छका १॥
3First set of six. ||
4रागु गोंड महला ५ चउपदे घरु १
5ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
6ईश्वर ही सब करने वाला एवं सब भोगने वाला है॥ १॥ रहाउ॥
7वह स्वयं ही सुनता एवं देखता है।
8एक वही दृश्य एवं अदृश्य है।
9सृष्टि की रचना और प्रलय भी वही करने वाला है।
10वह सर्वव्यापक है लेकिन स्वयं जग के मोह से निर्लिप्त है॥ १॥
11परमात्मा ही वक्ता है और वही सबकुछ जानता है।
12एक वही अवतार लेकर दुनिया में आता है और वही जाता भी है।
13एक परमात्मा ही निर्गुण एवं सगुण रूप में है।
14हे नानक ! वह समद्रष्टा ईश्वर तो गुरु की कृपा से ही मिलता है।॥२ ॥ १॥
15गोंड महला ५ ॥
16हे जीव ! तू मछली एवं बंदर की तरह यम के जाल में फँस चुका है और कुसुंभ के फूल जैसी माया के मोह में उलझा हुआ है।
17अपने भाग्यानुसार ही तू पैर रखता और साँस लेता है, यदि तू भगवान का गुणगान कर ले तो तेरा उद्धार हो सकता है॥ १॥
18हे मन ! जरा समझ ले और दुनिया का मोह छोड़ दे।
19अपने रहने के लिए स्थान नहीं मिला, फिर क्यों पराए घर जाता है। १॥ रहाउ॥
20जैसे कामवासना के स्वाद ने हाथी को वश में कर लिया है, वैसे ही तू परिवार के मोह में लगा हुआ है।
21जैसे पक्षी रात्रिकाल पेड़ पर इकट्टे होकर सुबह फिर बिछुड़ जाते हैं, वैसे ही परिवार के सदस्य बिछुड़ जाते हैं। सत्संग में मिलकर परमात्मा का ध्यान करने से स्थिरता मिल जाती है।॥ २ ॥
22जैसे जीभ के स्वाद के कारण मछली नाश हो जाती है, वैसे ही मूर्ख आदमी लोभ में फँसकर लुट जाता है।
23हे मन ! तू काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार-इन पाँच शत्रुओं के वशीभूत हो गया है, लेकिन भगवान की शरण लेने से छूट सकता है।॥ ३॥
24हे दीनों के दुखनाशक ! कृपालु हो जाओ, सब जीव तेरे पैदा किए हुए हैं।
25मैं सदैव तेरे दर्शन का दान चाहता हूँ मुझे मिलो, नानक तेरे दासों का दास है॥ ४ ॥ २ ॥
26रागु गोंड महला ५ चउपदे घरु २
27ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
28जिसने बनाकर यह जीवन एवं प्राण दिए हैं,
29मिट्टी रूपी शरीर में अपनी ज्योति रखकर तुझे बड़ाई दी है।
30तेरे उपयोग के लिए सबकुछ दिया एवं स्वादिष्ट भोजन खिलाता है।
31अरे मूर्ख ! उस प्रभु को त्याग कर किधर भटक रहा है॥ १॥
32परब्रह्म की सेवा में लग जाओ,
33उस निरंजन देव की सूझ तो गुरु से ही मिलती है॥ ५॥ रहाउ॥
34जिसने अनेक प्रकार के खेल-तमाशे बनाए हैं,
35एक क्षण में ही सृष्टि की उत्पति एवं प्रलय कर देता है,
36उस परमात्मा की गति एवं विस्तार बयान नहीं किया जा सकता।
37हे मेरे मन ! ऐसे प्रभु का सदैव ध्यान करो ॥ २॥
38वह सबका मालिक है, निश्चल है और जन्म-मरण के चक्र से दूर है।
39उसके गुण बेअंत हैं, जिन्हें गिना नहीं जा सकता।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं