गुरु ग्रंथ साहिब 860 · Raag Gond · Guru Raam Daas Ji
1मेरे सतगुरु ने मुझे यही सूझ दी है कि किसी भी जीव के हाथ में कुछ भी नहीं है।
2हे हरि ! नानक की आशा तू ही जानता है और तेरे दर्शन करके मैं तृप्त हो जाता हूँ॥ ४॥ १॥
3गोंड महला ४ ॥
4ऐसे ईश्वर की उपासना करनी चाहिए, नित्य उसका मनन करना चाहिए, जो क्षण में ही सब पाप नाश कर देता है।
5यदि परमात्मा को त्याग कर किसी अन्य की आशा करोगे तो सारी मेहनत निष्फल हो जाएगी।
6हे मेरे मन ! सुखों के दाता, स्वामी हरि की अर्चना करो, जिसकी अर्चना करने से सारी भूख दूर हो जाती है।॥ १॥
7हे मेरे मन ! भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।
8जहाँ भी जाता हूँ, वहाँ ही मेरा स्वामी मेरे साथ होता है। हरि अपने भक्तजनों एवं दासों की हमेशा ही लाज रखता है॥ १॥ रहाउ ॥
9यदि हम अपना दुख किसी को जाकर बताएँ तो आगे से वह अपने ही अनेक दुःख सुना देता है।
10इसलिए अपना दु:ख अपने स्वामी हरि के पास ही कहो, जो तेरे दुख तत्काल ही समाप्त कर देगा।
11हे मन ! सो ऐसे प्रभु को छोड़कर अपना दुख किसी अन्य के पास कहना तो शर्म से डूबकर मरने की तरह ही है॥ २॥
12हे मन ! संसार के जो परिवार, मित्र, भाई इत्यादि रिश्ते नजर आते हैं, वे तुझे अपने स्वार्थ के लिए ही मिलते हैं।
13जिस दिन उनका स्वार्थ तुझसे पूरा न हो, उस दिन से उनमें से कोई भी तेरे नेिकट नहीं आएगा।
14हे मेरे मन ! दिन-रात भगवान की भक्ति करो; जो तुझ पर उपकार करके दुखों को सुख में तबदील कर देता है॥ ३॥
15हे मेरे मन ! उस पर भरोसा कैसे किया जा सकता है? जो अन्तिम समय बचा नहीं सकता।
16गुरु का उपदेश लेकर हरि-मंत्र का जाप करो, अन्तिम समय हरि उन्हें यम से बचा लेता है, जिनके चित में उसका प्रेम बसता है।
17नानक कहते हैं कि हे भक्तजनो ! हर समय प्रभु का नाम जपो; यम से छूटने का यही सच्चा भरोसा है॥ ४॥ २॥
18गोंड महला ४ ॥
19परमात्मा का सिमरन करने से सदा ही आनंद एवं सुख मिलता है, इससे मन शीतल हो जाता है और बड़ी शांति मिलती है।
20जैसे सूर्य रूपी माया से मन बहुत जलता रहता है, वैसे ही चन्द्रमा रूपी गुरु के दर्शन करके सारा ताप दूर हो जाता है।॥ १॥
21हे मेरे मन ! नित्य परमेश्वर का ध्यान करो और उसका नाम जपो।
22जहाँ कहाँ सब स्थानों पर तेरी रक्षा करता है, सो ऐसे प्रभु की तू सदैव उपासना करता रह॥ १॥ रहाउ॥
23हे मेरे मन ! जिसमें सर्व सुखों के भण्डार हैं, उस परमात्मा को जपते रहो तथा गुरु के माध्यम से हरि नाम रूपी रत्न को खोज लो।
24जिन्होंने हरि का ध्यान किया है, उन्होंने उसे पा लिया है, हरि के उन दासों के चरणों की सेवा करो। २॥
25शब्द को पहचान कर राम रस प्राप्त करो, राम रस पा कर वह उत्तम संत एवं महान् बन गया है।
26अपने उस सेवक की बड़ाई परमात्मा ने स्वयं बड़ाई है और उसकी वह बड़ाई किसी के घटाने से एक तिल मात्र भी कम नहीं होती ॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं