सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 85 · Siree Raag · Guru Amar Daas Ji

1हे नानक ! सत्य नाम की आराधना करने से गुरमुख प्राणियों को मोक्ष प्राप्त हुआ है ॥ १ ॥

2महला १ II

3बातों में हम उत्तम विचार व्यक्त करते हैं परन्तु आचरण से अपवित्र हैं।

4मन में हम अशुद्ध और मलिन हैं परन्तु बाहरी वेशभूषा से सफेद दिखते हैं।

5हम उनकी समानता करते हैं जो प्रभु के द्वार पर उसकी सेवा में मग्न हैं।

6किन्तु वे अपने पति-परमेश्वर के रंग में लीन हैं और सुख एवं आनंद भोगती हैं।

7वे सशक्त होने पर भी विनीत होती हुई सदैव दीन एवं नम्र हैं।

8हे नानक ! हमारा जीवन तभी सफल हो सकता है, यदि हम उन मुक्तात्माओं के साथ संगति करें ॥२॥

9पउड़ी II

10हे जगत् के स्वामी ! तू स्वयं ही जल है और स्वयं ही जल में रहने वाली मछली है। हे प्रभु ! तू स्वयं ही मछली को फँसाने वाला जाल है।

11तुम स्वयं ही मछेरा बनकर मछली को पकड़ने हेतु जाल फैंकते हो और स्वयं ही जल में रखा हुआ टुकड़ा हो।

12हे ईश्वर ! तुम स्वयं ही सैंकड़ों हाथ गहरे जल में गहरे लाल रंग का निर्लिप्त कमल हो।

13हे भगवान ! जो प्राणी क्षण भर के लिए भी तुम्हारा चिन्तन करते हैं। उन्हें तुम स्वयं ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्त कर देते हो।

14हे परमेश्वर ! तेरे हुक्म से परे कुछ भी नहीं, गुरु के शब्द द्वारा तेरे दर्शन करके प्राणी कृतार्थ हो जाता है॥ ७॥

15श्लोक महला ३॥

16जो जीव-स्त्री परमेश्वर के आवेश को नहीं जानती, वह बहुत विलाप करती है।

17उसके मन में छल-कपट विद्यमान होता है, सो वह सुख की गहरी नींद नहीं सोती।

18यदि जीव-स्त्री अपने पति-प्रभु की इच्छानुसार चले, तो वह अपने प्रभु के दरबार एवं घर में ही सम्मान पा लेती है और पति-प्रभु उसे अपने आत्म-स्वरूप में बुला लेता है।

19हे नानक ! उसे यह ज्ञान भगवान की कृपा द्वारा ही होता है।

20गुरु की कृपा से वह सत्य में ही समा जाती है।॥१॥

21महला ३॥

22हे नामविहीन मनमुख ! माया का रंग कुसुंभे के फूल जैसा सुन्दर होता है। तू इसे देखकर भूल मत जाना।

23इसका रंग थोड़े दिन ही रहता है। इसका मूल्य भी बहुत न्यून है।

24जो व्यक्ति माया से प्रेम करते हैं, वे मूर्ख ज्ञानहीन एवं गंवार हैं।

25वे माया के मोह में जल कर मरते हैं। मरणोपरांत वे विष्टा के कीड़े बनते हैं, जो पुनः पुनः जन्म लेकर विष्टा में जलते रहते हैं।

26हे नानक ! जो व्यक्ति सहज अवस्था में गुरु के प्रेम द्वारा प्रभु-नाम में मग्न रहते हैं, वे सदैव ही सुख भोगते हैं।

27उनका भक्ति का प्रेम कभी नाश नहीं होता और वे सहज अक्स्था में समाए रहते हैं ॥२॥

28पउड़ी॥

29हे ईश्वर ! तुमने समूची सृष्टि की रचना की है और स्वयं ही भोजन देकर सबका पालन करते हो।

30कई प्राणी छल-कपट करके भोजन खाते हैं और अपने मुख से वह झूठ एवं असत्यता व्यक्त करते हैं।

31हे प्रभु ! जो तुम्हें भला प्रतीत होता है, तुम वहीं करते हो और प्राणियों को अलग-अलग कार्यों में लगाते हो और वह वही कुछ करते हैं।

32कई प्राणियों को तुमने सत्य नाम की सूझ प्रदान की है और उनको गुरु द्वारा नाम के अमूल्य भण्डार दिलवाए हैं।

33जो प्राणी ईश्वर का स्मरण करके खाते हैं उनका खाना फलदायक है। जो प्राणी ईश्वर को स्मरण नहीं करते, वह दूसरे से माँगने के लिए हाथ फैलाते हैं ॥८॥

34श्लोक महला ३ II

35माया-मोह के स्वाद कारण पण्डित वेदों को पढ़-पढ़कर उनकी कथा करते हैं।

36माया के प्रेम में मूर्ख मन ने भगवान के नाम को विस्मृत कर दिया है। अतः उसे प्रभु के दरबार में अवश्य दण्ड मिलेगा।

37जिस परमेश्वर ने मनुष्य को प्राण और शरीर दिया है, उसे वह कदाचित स्मरण नहीं करता, जो सबका भोजन देकर पालन कर रहा है।

38मनमुख प्राणियों के गले यम-पाश प्रतिदिन बना रहता है और वे सदैव जन्म-मरण के बंधन में कष्ट सहन करते हैं।

39ज्ञानहीन मनमुख इन्सान कुछ भी नहीं समझता और वही कुछ करता है जो पूर्व-जन्म के कर्मो अनुसार लिखा है।

40सौभाग्यवश जब सुखदाता सतिगुरु जी मिलते हैं तो हरि-नाम मनुष्य के हृदय में निवास करने लगता है।

41ऐसा व्यक्ति सुख ही भोगता है। उसके लिए सुख ही वस्त्रों का पहनावा है और उसका समूचा जीवन सुख में ही व्यतीत होता है।

42हे नानक ! अपने हृदय में से उस नाम को विस्मृत मत करो, जिसकी बदौलत सत्य के दरबार में शोभा प्राप्त होती है ॥१॥

43महला ३॥

44जिसने सतिगुरु की सेवा की है, उसे सुख ही उपलब्ध हुआ है। भगवान का सत्यनाम गुणों का खजाना है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं