गुरु ग्रंथ साहिब 856 · Raag Bilaaval · Bhagat Kabeer Ji
1मेरी जवानी की उम्र बीत गई है और बुढापा आ चुका है, लेकिन मैंने कोई भी शुभ कर्म नहीं किया।
2यह अमूल्य जीवन वासना में लगकर कौड़ियों के भाव हो गया है॥ ३॥
3कबीर जी कहते हैं कि हे मेरे माधव ! तू सर्वव्यापक है;
4तेरे समान अन्य कोई दयालु नहीं है तथा मेरे जैसा अन्य कोई पापी नहीं है।४ ॥ ३ ॥
5बिलावलु ॥
6(कबीर जी की माता कहती है कि) यह जुलाहा नित्य सुबह उठकर कोरी गागर में पानी भर कर लाता है और लीपते-लीपते इसकी जिंदगी भी बीत गई है।
7इसे ताना-बाना कुछ नहीं आता और यह हर वक्त हरि-नाम के रस में ही लिपटा रहता है॥ १
8हमारे कुल में किस व्यक्ति ने राम-नाम जपा है।
9जब से इस निपूत ने माला ली है, तब से हमें कोई सुख उपलब्ध नहीं हुआ॥ १॥ रहाउ ॥
10हे जेठानी ! जरा सुनो; हे देवरानी ! तुम भी सुनो; एक अद्भुत घटना हो गई है कि
11इस लड़के ने हमारा सूत का काम ही बिगाड़ दिया है, यह लड़का मर क्यों नहीं गया ॥ २ ॥
12(कबीर जी अपनी माता को उत्तर देते हैं कि) एक परमात्मा ही मेरा स्वामी है और वह सर्व सुखों का दाता है, मेरे गुरु ने मुझे उसका ही नाम दिया है।
13उसने ही भक्त प्रहलाद की लाज रखी थी और दुष्ट हिरण्यकशिपु दैत्य को नखों से फाड़कर वध कर दिया था।॥ ३॥
14अब मैंने अपने घर के देवताओं एवं पितरों की पूजा छोड़ दी है और गुरु का शब्द ले लिया है।
15कबीर जी कहते हैं कि एक वही सर्व पापों का खंडन करने वाला है और संतों ने उसे अपनाकर अपना उद्धार कर लिया है॥ ४ ॥ ४ ॥
16बिलावलु ॥
17हरि के समान कोई राजा नहीं है।
18दुनिया के यह सारे राजा चार दिनों के लिए ही हैं और यों ही अपने राज-प्रताप का झूठा दिखावा करते हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
19हे परमात्मा ! यदि कोई तेरा दास होगा, तो वह क्यों डगमगाएगा ? वह तो तीनों लोकों पर अपना हुक्म चलाता है।
20तेरे सेवक के ऊपर कोई भी अपना हाथ उठा नहीं सकता और तेरे जन की शक्ति का कोई अंदाजा नहीं लगा सकता॥ १॥
21हे मूर्ख एवं अज्ञानी मन ! परमात्मा को याद कर ताकेि तेरे अन्दर अनहद शब्द का बाजा बजने लगे।
22कबीर जी कहते हैं कि मेरा संशय एवं भ्रम दूर हो गया है, परमात्मा ने मुझे भक्त ध्रुव एवं भक्त प्रहलाद की तरह बड़ाई दी है॥ २॥ ५॥
23बिलावलु ॥
24हे परमेश्वर ! मुझे बचा लो, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है।
25न ही चरित्रवान् बना, न ही कोई धर्म किया, न जप किया और न ही तेरी भक्ति की अपितु अभिमान में कुपथ पर ही चलता रहा ॥ १ ॥ रहाउ॥
26अपनी इस काया को अमर मानकर इसका पोषण करता रहा किन्तु यह कच्ची गागर की तरह मिथ्या ही निकली।
27जिस परमात्मा ने दया करके मुझे सुन्दर बना कर पैदा किया है, मैं उसे ही भुलाकर दुनिया के लगाव में लगा रहा ॥ १ ॥
28हे मालिक ! मैं तेरा चोर हूँ और तेरा साधु नहीं कहला सकता, मैं तेरे चरणों की शरण में आ पड़ा हूँ।
29कबीर जी कहते हैं कि हे प्रभु जी ! मेरी यह विनती सुनो; मुझे यमराज की कोई भी खबर मत भेजना ॥ २ ॥ ६॥
30बिलावलु ॥
31हे परमात्मा ! मैं बहुत लाचार होकर तेरे दरबार में आ खड़ा हूँ।
32तेरे बिना अन्य कौन मेरी देखरेख करे ? किवाड़ खोलकर मुझे दर्शन दीजिए॥ १॥ रहाउ॥
33तुम बहुत धनवान, उदारचित एवं त्यागी हो और अपने कानों से तुम्हारा ही सुयश सुनता रहता हूँ।
34मैं तुझसे क्या दान मॉगू? मैं सब को ही कंगाल देखता हूँ और तुझ से ही मेरा निस्तार होना है॥ १॥
35जयदेव, नामदेव एवं सुदामा ब्राह्मण जैसे इन भक्तों पर तेरी अपार कृपा हुई है।
36कबीर जी कहते हैं कि हें दाता ! तू सर्वकला समर्थ है और जीवों को धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष पदार्थ देते तुझे कोई देरी नहीं लगती॥ २॥ ७ ॥
37बिलावलु ॥
38योगी हाथ में डण्डा, कानों में मुद्रा, कफनी पहनकर, बगल में झोली लटकाकर
39वेषधारी बनकर भ्रम के भाव में ही भटकता रहता है॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं