गुरु ग्रंथ साहिब 855 · Raag Bilaaval
1पउड़ी ॥
2यदि कोई सतगुरु का निंदक हो, परन्तु वह फिर से गुरु की शरण में आ जाए तो
3सतगुरु उसके पिछले गुनाह क्षमा करके उसे सत्संगति से मिला देता है।
4जैसे बारिश होने पर गलियों, नालियों एवं तालाबों का जल जाकर गंगा में मिल जाता है तो वह गंगा में मिलने से पवित्र-पावन हो जाता है।
5यही बड़ाई निर्वेर सतगुरु में है कि उसे मिलने से इन्सान की तृष्णा एवं भूख दूर हो जाती है और मन में हरेि के मिलाप से तुरंत शान्ति पैदा हो जाती है।
6हे नानक ! मेरे सच्चे बादशाह हरि का अद्भुत कौतुक देखो कि जो व्यक्ति सतगुरु को श्रद्धा से मानता है, वह सबको प्यारा लगता है॥ १३॥ १॥ शुद्ध ॥
7बिलावलु बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ की
8Of Kabeer Jee:
9ੴ सति नामु करता पुरखु गुर प्रसादि ॥
10यह संसार ऐसा अद्भुत खेल है कि इसमें कोई भी सदा के लिए रह नहीं सकता अर्थात् मृत्यु अटल है।
11हे जीव ! तू सीधे-सीधे राह पर चलता जा, अन्यथा यम बहुत धुरा धक्का देता है॥ १॥ रहाउ॥
12हे भाई ! बालक, वृद्ध एवं युवक सभी को मृत्यु अपने साथ ले जाती है।
13मनुष्य बेचारा तो एक चूहा बना हुआ है, जिसे मृत्यु रूपी बिल्ली निगल लेती है॥ १॥
14चाहे कोई अपने आपको धनवान एवं निर्धन मान रहा है लेकिन मृत्यु को किसी का कोई लिहाज नहीं है।
15यम इतना बलशाली है कि वह राजा एवं प्रजा को एक समान समझकर मारता है॥ २ ॥
16जो हरि के सेवक हरि को अत्यंत प्रिय हैं, उनकी कथा बड़ी निराली है।
17वे जगत् के आवागमन से मुक्त हैं और परमात्मा खुद उनका सहायक है॥ ३॥
18हे प्रिय मन ! अपने पुत्र, पत्नी और लक्ष्मी रूपी माया का मोह त्याग दो।
19कबीर जी कहते हैं कि हे संतजनो ! सुनो; इनका त्याग करने से तुम्हें ईश्वर मिल जाएगा ॥ ४ ॥ १॥
20बिलावलु ॥
21में कोई विद्या नहीं पढ़ता और न ही वाद-विवाद को जानता हूँ।
22मैं भगवान् के गुण कथन कर करके एवं सुन-सुनकर बावला हो गया हूँ॥ १॥
23हे मेरे बाबा ! मैं तो बावला हूँ, अन्य सारी दुनिया बुद्धिमान है, एक मैं ही बौरा हूँ।
24मैं तो बिगड़ गया हूँ, देखना, मेरी तरह कोई अन्य भी बिगड़ न जाए॥ १॥ रहाउ॥
25मैं स्वयं बावला नहीं बना, अपितु मेरे राम ने बावला मुझे बनाया है।
26सतगुरु ने मेरा भ्रम जला दिया है॥ २॥
27मैंने बिगड़ कर अपनी मति खो दी है किन्तु
28मेरे भ्रम में कोई मत भूले ॥ ३॥
29वही बावला होता है, जो अपने आपको नहीं पहचानता।
30यदि वह अपने आपको पहचान ले तो वह परमात्मा को जान लेता है॥ ४ ॥
31जो व्यक्ति अब अपने जीवन में परमात्मा के रंग में मतवाला नहीं हुआ, वह फिर कभी भी मतवाला नहीं हो सकता।
32कबीर जी कहते हैं कि मैं तो राम के रंग में लीन हो गया हूँ॥ ५ ॥ २॥
33बिलावलु ॥
34यदि घर-परिवार को त्याग कर किसी वन में चले जाएँ और वहाँ कन्दमूल चुन-चुनकर खाते रहें
35तो भी यह पापी एवं मंदा मन विकारों को नहीं छोड़ता॥ १॥
36कैसे छूट सकता हूँ, कैसे इस बड़े भयानक संसार सागर से पार हो सकूंगा ?
37हे मेरे प्रभु ! तेरी शरण में आया हूँ, मेरी रक्षा करो।॥ १॥ रहाउ ॥
38अनेक प्रकार के विषय-विकारों की वासना मुझसे छोड़ी नहीं जाती।
39में अनेक यत्न करके मन को रोकता हूँ किन्तु यह वासना फिर से लिपट जाती है॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं