गुरु ग्रंथ साहिब 852 · Raag Bilaaval · Guru Amar Daas Ji
1गुरुमुख सत्य को ही देखता है, सत्य ही बोलता है और नाम जपकर सुख प्राप्त करता है।
2हे नानक ! गुरुमुख के मन में ज्ञान का प्रकाश हो गया है और अज्ञान रूपी घोर अंधेरा दूर हो गया है ॥ २ ॥
3महला ३॥
4मनमुखी जीव मन के मैले होते हैं और ऐसे मूर्ख मरते ही रहते हैं।
5लेकिन गुरुमुख निर्मल हैं और उन्होंने भगवान को अपने हृदय में बसाया हुआ है।
6नानक का कथन है कि हे मेरे भाई, भक्तजनो ! जरा सुनो;
7सतगुरु की सेवा करो, इससे अहंत्व रूपी मैल दूर हो जाती है।
8मनमुख के मन में संशय बना रहता है, इसलिए उसे दुख ही प्रभावित करता रहता है और वह जगत् के धंधों में अपना सिर खपाता रहता है।
9जो जीव द्वैतभाव में सोये रहते हैं, वे कभी नहीं जागते, अपितु मोह-माया से ही उनका प्यार बना रहता है।
10मनमुख का विचार अर्थात् सोचने का ढंग यही है केि वह न तो परमात्मा का नाम याद करता है और न ही शब्द का चिंतन करता है।
11उसे हरि का नाम कभी नहीं भाया और उसने अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा लिया है। हे नानक ! ऐसे जीव को यम मार-मार कर ख्वार करता है॥ ३॥
12पउड़ी॥
13वही सच्चा शाह है, जिसे ईश्वर ने भक्ति एवं सत्य का दान दिया है।
14सारी दुनिया ही उसकी मोहताजी करती है और किसी अन्य दुकान पर नाम रूपी वस्तु नहीं मिलती, न ही इसका व्यापार होता है।
15जो व्यक्ति भक्तजनों के सम्मुख रहता है, उसे हरि-नाम रूपी राशि मिल जाती है, किन्तु विमुख जीव को भस्म ही प्राप्त होती है।
16हरि के भक्त हरि-नाम के व्यापारी हैं और यम रूपी महसूलिया उनके निकट नहीं आता।
17दास नानक ने भी हरि-नाम रूपी धन लाद लिया है, इसलिए वह सदा बेपरवाह है॥ ७ ॥
18श्लोक महला ३॥
19इस युग में भक्तों ने ही हरि-धन का लाभ प्राप्त किया है तथा अन्य समूचा जगत् भ्रम में भूला हुआ है।
20गुरु की कृपा से जिसके मन में नाम स्थित हो गया है, उसने रात-दिन नाम का ही मनन किया है।
21वह विष रूपी माया में से निर्लिप्त बना रहता है और शब्द द्वारा उसने अपने अहंकार को जला दिया है।
22वह स्वयं भवसागर में से पार हो गया है और उसकी सारी कुल का भी उद्धार हो गया है, उसे जन्म देने वाली माता धन्य है।
23उसके मन में सदैव सहज सुख बसा रहता है और सत्य में ही लगन लगी रहती है।
24त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु एवं शिवशंकर तथा रजोगुणी मनुष्य, तमोगुणी दैत्य तथा सतोगुणी देवता भी भूले हुए हैं और उन्होंने अपना अहंकार माया का मोह बढ़ा लिया है।
25धर्म ग्रंथों को पढ़-पढ़कर पण्डित एवं मौनधारी मुनि भी भूले हुए और उन्होंने द्वैतभाव में अपना चित्त लगाया हुआ है।
26योगी, जंगम एवं सन्यासी भी भटके हुए और गुरु के बिना किसी को भी परमतत्व प्राप्त नहीं हुआ।
27मनमुखी जीव भ्रम में फॅसकर भूले हुए हैं, सदैव दुखी रहते हैं और उन्होंने अपना जन्म व्यर्थ गंवा दिया है।
28हे नानक ! नाम में लीन रहने वाले जीव सदैव स्थिर रहते हैं और ईश्वर ने करुणा करके उन्हें स्वयं मिला लिया है॥ १॥
29महला ३॥
30हे नानक ! उसकी स्तुति करनी चाहिए, जिसके वश में सबकुछ है।
31हे प्राणियो ! परमात्मा को याद करो; उसके सिवा अन्य कोई नहीं है।
32गुरुमुख के अन्तर्मन में ईश्वर बस जाता है और वह सदैव सुखी रहता है।॥ २॥
33पउड़ी॥
34जिन्होंने गुरु से हरि-नाम धन प्राप्त नहीं किया, वे इस जग में दिवालिया बने रहते हैं।
35वे सारे जगत् में माँगते रहते हैं, परन्तु कोई उनके मुँह पर थूकता भी नहीं।
36वे पराई निन्दा करते रहते हैं, लेकिन अपना भरोसा भी गंवा देते हैं, अपितु अपना आप दूसरों के समक्ष जतला देते हैं।
37जिस धन के लिए वे चुगली करते हैं, पर वह धन चुगली करने से भी उनके हाथ नहीं आता, चाहे वे कहीं भी जाकर यत्न कर लें।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं