गुरु ग्रंथ साहिब 851 · Raag Bilaaval · Guru Amar Daas Ji
1मनमुख अज्ञानी जीव अन्धा ही है, वह जन्मता-मरता रहता है और बार-बार दुनिया में आता जाता रहता है।
2उसका कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता और अन्त में पछताता हुआ चल देता है।
3जिस पर प्रभु-कृपा होती है, उसे सतगुरु मिल जाता है और फिर वह प्रभु-नाम का ही ध्यान करता रहता है।
4नाम में लीन रहने वाला उपासक सदैव सुख हासिल करता है और नानक तो उस पर ही बलिहारी जाता है ॥ १ ॥
5महला ३॥
6आशा एवं अभिलाषा जगत् को मोह लेने वाली है, जिन्होंने पूरा संसार मोह लिया है।
7जितना भी यह जगत्-आकार है, हर कोई मृत्यु के वश में है।
8परमात्मा के हुक्म से ही मृत्यु आती है, वही बचता है, जिसे करतार क्षमा कर देता है।
9हे नानक ! गुरु की कृपा से यह मन तो ही भवसागर से पार होता है, जब अहंकार छोड़ देता है।
10गुरु-शब्द का चिंतन करके जीव अपनी आशा-अभिलाषा को मिटा कर वैरागी हो जाता है।॥ २ ॥
11पउड़ी ॥
12इस जगत् में जिधर भी जाएँ, उधर ही प्रभु स्थित है।
13सच्चा न्याय करने वाला परमात्मा आगे परलोक में भी सर्वत्र स्वयं ही कार्य चला रहा जिसने सत्य की है।
14वहाँ झूठे लोगों का ही तिरस्कार होता है, लेकिन सच्चे प्रभु की भक्ति करने वाले को शोभा प्राप्त होती है।
15सबका मालिक एक ईश्वर सत्य है, उसका न्याय भी सत्य है, निन्दकों के सिर पर धूल ही पड़ती है।
16हे नानक ! गुरु के माध्यम से आराधना की है, उसने ही सुख पाया है॥ ५ ॥
17श्लोक महला ३ ॥
18यदि प्रभु अनुकम्पा कर दे तो ही पूर्ण भाग्य से सतगुरु प्राप्त होता है।
19जीवन में सब उपायों से उत्तम उपाय यही है कि जीव को नाम प्राप्त हो जाए।
20इससे मन को बड़ी शान्ति मिलती है और हृदय सदैव सुखी रहता है।
21हे नानक ! नामामृत ही उस जीव का खाना-पहनना अर्थात् जीवन-आचरण बन जाता है और नाम से ही लोक-परलोक में बड़ाई मिलती है। १॥
22महला ३॥
23हे मन ! गुरु की सीख सुन, इस प्रकार तुझे गुणों का भण्डार (परमात्मा) प्राप्त हो जाएगा।
24सुख देने वाला ईश्वर तेरे मन में स्थित हो जाएगा और तेरा अहंत्व एवं अभिमान दूर हो जाएगा।
25हे नानक ! नामामृत एवं गुणों का कोष उसकी कृपा-दृष्टि से ही पाया जाता है।॥ २॥
26पउड़ी॥
27दुनिया में जितने भी बादशाह, शाह, राजा, खान, उमराव एवं सरदार हैं, वे सभी ईश्वर के ही पैदा किए हुए हैं।
28जो कुछ ईश्वर अपनी मर्जी से उनसे करवाता है, वे वही कार्य करते हैं। वास्तव में वे सभी प्रभु के सन्मुख भिखारी हैं।
29सो ऐसा परमात्मा सबका मालिक है, जो सतगुरु के पक्ष में है। उसने सभी वर्णो, चारों स्रोतों एवं सारी सृष्टि के जीव सतगुरु के आगे सेवा करने के लिए उसके सेवक बना दिए हैं।
30हे संतजनो ! देखो, ईश्वर-उपासना की इतनी महिमा है कि उसने काया रूपी नगरी में से सभी दुश्मन दूतों-काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार को नष्ट करके बाहर निकाल दिया है।
31हरि भक्तजनों पर कृपालु हो गया है और कृपा करके उसने स्वयं ही बचा लिया है॥ ६ ॥
32श्लोक महला ३ ॥
33मनमुख का ध्यान नहीं लगता, मन में कपट होने के कारण सदैव दुख भोगता रहता है।
34वह दुख में ही कार्य करता है और हर वक्त दुख में ही ग्रस्त रहता है और आगे परलोक में भी दुखी रहता है।
35यदि प्रभु-कृपा हो जाए तो सतगुरु से भेंट हो जाती है और सत्य-नाम में लगन लग जाती है।
36हे नानक ! फिर सहज ही सुख प्राप्त हो जाता है, जिससे मन में से भ्रम एवं मृत्यु का भय दूर हो जाता है ॥ १॥
37महला ३॥
38गुरुमुख सदैव हरि-रंग में लीन रहता है और हरि का नाम ही उसे भाता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं