गुरु ग्रंथ साहिब 850 · Raag Bilaaval
1श्लोक महला ३॥
2वास्तव में ब्राह्मण वही है, जो ब्रह्म को पहचानता है और सतगुरु की रज़ा में चलता है।
3जिनके हृदय में भगवान स्थित होता है, उनका अहंकार का रोग दूर हो जाता है।
4जो गुण गातें है और गुणों का संग्रह करते है वे परम-ज्योति में विलीन हो जाते है।
5इस संसार में विरले ही ब्राह्मण हैं, जो एकाग्रचित होकर ब्रह्म को जानते हैं।
6हे नानक ! जिन पर सच्चा परमात्मा अपनी कृपा-दृष्टि करता है, वे नाम में ही तल्लीन रहते हैं॥ १॥
7महला ३॥
8जिसने सतगुरु की सेवा नहीं की और न ही शब्द में श्रद्धा रखी है,
9उसे अहंकार का अति दीर्घ रोग ही लगा है, जो अनेक प्रकार के विकारों के स्वाद में फँसा रहता है।
10मन के हठ द्वारा कर्म करने से जीव बार-बार योनियों में पड़ता रहता है।
11उस गुरुमुख का जन्म-सफल है, जिसे परमात्मा अपने साथ मिला लेता है।
12हे नानक ! जब करुणा-दृष्टि करने वाला अपनी कृपा-दृष्टि करता है तो ही मनुष्य नाम-धन हासिल करता है॥ २॥
13पउड़ी॥
14हरि-नाम में सब बड़ाईयाँ हैं, अतः गुरु के सान्निध्य में हरि का ध्यान करना चाहिए।
15यदि नाम में चित्त लगाया जाए तो इन्सान जिस वस्तु की कामना करता है, वही उसे मिल जाती है।
16यदि सतगुरु के पास मन की गहरी बात की जाए तो सर्व सुख प्राप्त हो जाते हैं।
17पूर्ण गुरु जीव को उपदेश देता है तो सारी भूख मिट जाती है।
18पूर्व से ही जिसके भाग्य में लिखा होता है, वही भगवान का गुणगान करता है॥ ३॥
19श्लोक महला ३॥
20मेरा प्रभु संयोग बनाकर जिसे गुरु से मिला देता है, वह कोई भी सतगुरु से खाली हाथ नहीं लौटता।
21सतगुरु का दर्शन सफल है, जैसी किसी की कामना होती है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
22गुरु का शब्द अमृत की तरह है, जिससे सारी तृष्णा एवं भूख मिट जाती है।
23हरि रस पान करके संतोष हो गया है, और मन में सत्य का निवास हो गया है।
24सत्य का ध्यान करने से अमर पद प्राप्त हो गया है और मन में अनहद शब्द गूंज रहा है।
25दसों दिशाओं में सत्य का ही प्रसार है, यह अवस्था गुरु के सहज स्वभाव से प्राप्त हुई है।
26हे नानक ! जिनके अन्तर्मन में सत्य मौजूद है, ऐसे भक्तजन किसी के छिपाने से नहीं छिपते अर्थात् लोकप्रिय हो जाते हैं।॥ १॥
27महला ३॥
28गुरु की सेवा करने से ही ईश्वर को पाया जा सकता है, जिस पर वह अपनी कृपा कर देता है।
29जिन्हें उसने सच्ची भक्ति दी है, वे मनुष्य से देवते बन गए हैं।
30गुरु के शब्द द्वारा जिनका जीवन-आचरण शुद्ध हो जाता है, उनका अहंत्व नाश करके ईश्वर उन्हें अपने साथ मिला लेता है।
31हे नानक ! जिन्हें ईश्वर नाम रूपी बड़ाई देता है, वे सहज ही उससे मिले रहते हैं।२॥
32पउड़ी।
33सतगुरु में नाम की बड़ी बड़ाई कर्ता परमेश्वर ने स्वयं ही बढ़ाई है।
34गुरु के सेवक एवं शिष्य इस बड़ाई को देख देखकर ही जी रहे हैं और उनके हृदय को यही भाया है।
35परन्तु निंदक-दुष्ट गुरु की बड़ाई को सहन नहीं कर सकते और उन्हें दूसरों का भला अच्छा नहीं लगता।
36जब गुरु की सत्य से प्रीति बनी हुई है तो किसी के विरोधाभास से कुछ नहीं हो सकता।
37जो बात परमात्मा को अच्छी लगती है, वह दिन-ब-दिन प्रगति करती रहती है, लेकिन दुनिया के लोग यों ही धक्के खाते रहते हैं॥ ४॥
38श्लोक महला ३॥
39जो मोह-माया में चित्त को लगाती है, उसको द्वैतभाव की यह आशा धिक्कार योग्य है।
40नाशवान पदार्थों के मोह में फँसकर हमने सच्चा सुख त्याग दिया है और प्रभु नाम को भुलाकर हम दुख ही भोग रहे हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं