गुरु ग्रंथ साहिब 84 · Siree Raag · Guru Nanak Dev Ji
1जो प्राणी जीवन काल का विचार करता है, वही परमात्मा का सच्चा भक्त होता है।
2भगवान कुदरत में निवास करता है परन्तु उसका मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
3यदि इन्सान मूल्य जान भी ले, तो वह ब्यान नहीं कर सकता।
4कुछ लोग शरीयत द्वारा मालिक-प्रभु बारे विचार करते हैं।
5परन्तु ईश्वर को समझने के बिना वह किस तरह पार हो सकते हैं ?
6धैर्य को नमन करो और मन को नाम-सिमरन में लगाने का जीवन-मनोरथ बनाओ ।
7फिर जिस तरफ भी देखोगे, उधर ही ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन करोगे ॥१॥
8महला ३॥
9गुरु की संगति (शारीरिक रूप से) निकट अथवा दूर रहने से प्राप्त नहीं होती।
10हे नानक ! सतिगुरु तभी मिलते हैं, यदि मन उनकी उपस्थिति के अन्दर सदैव विचरण करे ॥२॥
11पउड़ी॥
12सृष्टि में सात द्वीप, सात समुद्र, नौ खण्ड, चार वेद एवं अठारह पुराण हैं।
13हे प्रभु ! तुम इन सबमें विद्यमान हो और तुम सबको प्रिय हो।
14हे सारिंगपाणि ईश्वर ! समस्त जीव-जन्तु सदैव तुम्हारा ही सिमरन करते हैं।
15जो गुरमुख हरि की वंदना करते हैं, मैं उन पर कुर्बान जाता हूँ।
16हे ईश्वर ! तुम ही आश्चर्यजनक लीलाओं को रचकर स्वयं ही सबमें विद्यमान हो रहे हो ॥४॥
17श्लोक महला ३ ॥
18लेखनी और दवात मंगवाने की क्या आवश्यकता है? जो लिखना चाहते हो, उसे अपने हृदय में ही लिखो।
19हृदय में लिख लेने से तुम सदैव प्रभु के प्रेम में लीन रहोगे और कभी भी उस परमेश्वर से अलग नहीं होगे।
20कलम और दवात नाशवान हैं, लिखित कागज भी नष्ट हो जाएगा।
21हे नानक ! जो प्रेम प्रभु ने प्रारम्भ से ही जीव की किस्मत में लिख दिया है, वह प्रेम कभी भी मिट नहीं सकता ॥१॥
22महला ३॥
23जो वस्तु दृश्यमान है, वह कभी अनंतकाल तक प्राणी का साथ नहीं देती। चाहे तुम परख कर देख सकते हो।
24अतः सतिगुरु ने सदैव सत्य की प्रेरणा दी है; उसी सत्य में सुरति लगाने से सत्य की प्राप्ति होगी।
25हे नानक ! वह सत्य प्रभु नाम द्वारा ही मिलता है, किन्तु उसकी उपलब्धि शुभ कर्मों से होती है।॥२॥
26पउड़ी॥
27हे प्रभु ! अन्दर-बाहर अर्थात् समस्त सृष्टि में तू ही मौजूद है। इस रहस्य को तू ही जानता है।
28मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसको परमात्मा जानता है। हे मेरे मन ! तू ईश्वर का चिन्तन कर।
29जो प्राणी पाप करता है, केवल वही भय में रहता है। परन्तु धर्म करने वाला नित्य प्रसन्नचित्त रहता है।
30हे भगवान ! तुम सत्य-स्वरूप हो, तुम्हारा न्याय भी सत्य है। अतः (प्रभु की शरण में) हमें किस बात का भय है।
31हे नानक ! जिन्होंने सत्य (परमात्मा) को पहचान लिया, वे उस सत्य में ही विलीन हो जाते हैं ॥५॥
32श्लोक महला ३॥
33दवात सहित कलम भी जल जाए, लिखा हुआ कागज भी जल जाए,
34स्वयं लिखने वाला भी जल कर मर जाए, जिसने द्वैत-भाव बारे लिखा है।
35हे नानक ! प्राणी वही कर्म करता है, जो उसके पूर्व-जन्म के कर्म-फलानुसार है। अन्य कुछ नहीं किया जा सकता॥१॥
36महला ३॥
37भगवान के नाम के सिवाय अन्य कुछ पढ़ना एवं बोलना मिथ्या है। ये तो माया से प्रेम उत्पन्न करते हैं।
38हे नानक ! भगवान के नाम के सिवाय कुछ भी अटल नहीं रह सकता। इसके अलावा अन्य पढ़-पढ़कर मनुष्य नष्ट ही होते हैं।
39पउड़ी॥
40भगवान की महिमा महान है और भगवान का भजन करना ही जीव हेतु उत्तम है।
41भगवान की महिमा महान है, क्योंकि भगवान का न्याय धर्म का है।
42भगवान की महिमा महान है, जो जीव को महिमा करने का ही फल प्राप्त होता है।
43भगवान की महिमा महान है, जो वह निंदक की बात नहीं सुनता।
44भगवान की महिमा महान है, क्योंकि वह बिना पूछे ही सबकी कामनाएँ पूरी करता है ॥६॥
45श्लोक महला ३॥
46सारी दुनिया मैं-मैं अर्थात् अहंकार करती हुई नष्ट हो गई है। मृत्यु के समय यह धन-संपति किसी के साथ नहीं जाती।
47मोह-माया में फँसकर सभी ने दुःख ही प्राप्त किया है। यमदूत सभी को प्रताड़ित करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं