सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 847 · Raag Bilaaval

1बिलावलु महला ५ छंत

2ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

3हे सखी ! आओ, निष्ठापूर्वक आओ, हम सब मिलकर प्रभु का मंगलगान करें।

4हे सखी ! अपने अभिमान को त्याग दो, शायद इस तरह प्रियतम को भा जाएँ।

5अपना अहंकार, मोह एवं विकारों को त्यागकर पावन रूप ईश्वर की उपासना करो।

6उस दयालु प्रेियतम के चरणों की शरण में लग जाओ, वह सब पाप नाश करने वाला है।

7अपनी उदासी को तजकर प्रभु के दासों की दासी बन जाओ, फिर तुझे दोबारा भटकना नहीं पड़ेगा।

8नानक विनय करते हैं कि हे परमेश्वर ! ऐसी कृपा करो कि तेरा स्तुतिगान करते रहें ॥ १ ॥

9मेरे प्रिय का अमृत नाम अन्धे के लिए छड़ी के सामान है।

10सूंदर मोहिनी अनेक प्रकार से जीव को आकर्षित करने का प्रयास करती है।

11यह मोहिनी बड़ी विचित्र एवं चंचल है और जीवों को अनेक नखरे दिखाती है।

12यह ढीठ बनकर मन को मीठी लगने लगती है, इसी वजह से जीव को परमात्मा का नाम स्मरण नहीं होता।

13यह घर, वन, तट, व्रत-पूजा करते वक्त, राह-घाट हर जगह छलती रहती है।

14नानक विनय करते हैं हे परमात्मा ! दया करो; तेरा नाम ही मुझ अन्धे के लिए छड़ी समान है॥ २॥

15हे प्रिय नाथ ! तुझे उपयुक्त लगे, वैसे ही मुझ अनाथ की रक्षा करो।

16कोई चतुराई नहीं जानती कि अपने मुंह से कुछ कहकर तुझे प्रसन्न कर सकूं।

17मैं चतुर, सुघड़, समझदार एवं बुद्धिमान भी नहीं। में निर्गुण हूँ और मुझ में कोई गुण नहीं।

18न मेरा रूप, सौन्दर्य है और न ही सुन्दर नयन हैं। जैसे तुझे ठीक लगता है, वैसे ही मुझे रखो।

19हे करुणापति ! सारे लोग तेरी जय-जयकार करते रहते है और तेरी गति कोई नहीं जानता।

20नानक विनय करते हैं कि हे प्रभु ! मैं तेरा सेवक हूँ, मुझे अपनी सेवा का अवसर दीजिए, जैसे तुझे उपयुक्त लगे, वैसे ही मेरी रक्षा करो।॥ ३॥

21हे प्रभु में मछली हूँ और तू पानी है, तेरे बिना मेरा गुजारा कैसे हो सकता है?

22मैं पपीहा हूँ और तू स्वाति- बूंद है। में तभी तृप्त होता हूँ जब यह बूंद मेरे मुँह में पड़ती है।

23यह बूंद मुँह में पड़ने से मेरी प्यास बुझा देती है। हे प्राणपति ! तू मेरी जिन्दगी और हृदय है।

24हे लाडले ! तेरे लाड लडाने से हमारी गति हो जाती है।

25जैसे चकवी को आशा होती है कि दिन उदय होगा, वैसे ही में चित्त में तुझे याद करती रहती हूँ कि मेरा अज्ञान रूपी अंधेरा मिट जाए।

26नानक विनय करते हैं कि मुझे प्रभु ने अपने साथ मिला लिया है और मछली के समान परमात्मा रूपी जल को नहीं भूलती ॥ ४॥

27मेरा भाग्य अच्छा है कि प्रभु मेरे घर में आ गया है।

28मेरे घर के द्वार सुन्दर हो गए हैं और सारा बाग हरा-भरा हो गया है।

29सुख देने वाले स्वामी ने मेरा जीवन खुशहाल कर दिया है। अब मन में बड़ा आनंद, खुशियाँ एवं स्वाद बना रहता है।

30मेरा सुकुमार पति सदैव नवीन एवं बड़ा सुन्दर है, फिर मैं अपनी जीभ से उसके कौन-से गुण बखान करूँ ?

31मेरी सेज सुन्दर हो गई है और उसे देखकर मेरा सारा संशय एवं दुख समाप्त हो गया है।

32नानक विनय करते हैं कि अपरंपार स्वामी के मिलन से मेरी आशा पूरी हो गई है॥ ५॥ १॥ ३॥

33बिलावलु महला ५ छंत मंगल

34ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

35श्लोक ॥

36मेरा प्रिय प्रभु बड़ा सुन्दर, शान्ति का पुंज, दयालु एवं सर्व सुखों का भण्डार है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं