गुरु ग्रंथ साहिब 845 · Raag Bilaaval · Guru Raam Daas Ji
1हरि नाम भक्तवत्सल है, गुरु के माध्यम से हरि में लीन हुआ रहता हूँ।
2जैसे जल के बिना मछली नहीं रह सकती, वैसे ही भक्तजन हरि-नाम के बिना जीवित नहीं रह सकते।
3हे नानक ! जिसने ईश्वर को पा लिया है, उसका जीवन सफल हो गया है॥ ४ ॥ १ ॥ ३ ॥
4बिलावलु महला ४ श्लोक॥
5अपने सज्जन प्रभु को ढूंढ लो, जिसके मन में बस जाता है, वही भाग्यशाली है।
6हे नानक ! पूर्ण गुरु ने मुझे उसके दर्शन करवा दिए हैं, इसलिए अब मेरी परमात्मा में ही लगन लगी हुई है॥ १॥
7छंद ॥
8मैं अपने अहंकार रूपी विष को दूर करके प्रभु से रमण करने आई हूँ।
9गुरु के उपदेश द्वारा मैंने अपने आत्माभिमान को मिटा दिया है और मेरी वृति हरि-नाम में लगी रहती है।
10मेरा हृदय कमल खिल गया है, गुरु के ज्ञान ने जगा दिया है।
11हे नानक ! पूर्ण भाग्य से परमात्मा को प्राप्त किया है ॥ १॥
12प्रभु ही मेरे मन को भाया है और हरि-नाम ही मेरी बधाई है।
13पूर्ण गुरु द्वारा प्रभु को पाकर उसमें ही लगन लगाई है।
14मेरा अज्ञान का अंधेरा मिट गया है और मन में ज्योति प्रज्वलित हो गई है।
15हे नानक ! नाम ही मेरा जीवनाधार है और हरि-नाम में ही हो गई हूँ॥ २॥
16जब प्रभु को अच्छी लगी तो ही प्यारे प्रभु ने उससे रमण किया।
17उसकी आँखें प्रेम में ऐसे आकर्षित हो गई जैसे बिल्ली की आँखें चूहे की ओर होती हैं।
18पूर्ण गुरु ने हरि से मिला दिया है और हरि-रस पीकर तृप्त हो गई है।
19हे नानक ! हरि-नाम द्वारा उसका हृदय-कमल खिल गया है और वह हरि में ही लगन लगा कर रखती है॥ ३॥
20ईश्वर ने कृपा करके मुझ मूर्ख एवं नासमझ को अपने साथ मिला लिया है।
21वह गुरु धन्य है, प्रशंसा का पात्र है, जिसने मेरा अहंकार नाश कर दिया है।
22जिन भाग्यशालियों का भाग्य उदय हो गया है, उन्होंने परमात्मा को अपने हृदय में बसा लिया है।
23हे नानक ! तू नाम की स्तुति करता रह और नाम पर बलिहारी हो जा।॥ ४ ॥ २ ॥ ४॥
24बिलावलु महला ५ छंत
25ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
26हे सखी ! बड़ा खुशी का अवसर आ बना है, मैंने अपने प्रभु का यशोगान किया है।
27जब अपने अविनाशी वर का नाम सुना तो मेरे मन में बड़ा चाव उत्पन्न हो गया।
28बड़े भाग्य से मेरे मन में उसके लिए प्रीति लगी है, अब पूर्ण पति-प्रभु से कब मिलन होगा ?
29हे सखी ! मुझे ऐसी शिक्षा दो कि मैं गोविंद को पा लूं और सहज ही उसमें लीन रहूँ।
30मैं दिन-रात उसकी बड़ी सेवा करूँगी, फिर किस युक्ति से प्रभु को पाया जा सकता है।
31नानक की विनती है कि हे प्रभु ! कृपा करके मुझे अपने साथ मिला लो॥ १॥
32जब शुभ समय आया तो मैंने हरि रूपी रत्न खरीद लिया।
33खोजी ने खोज कर उसे हरि के संतों से ढूंढा है।
34मुझे प्यारे संत मिल गए हैं, जो दया करके अकथनीय कथा करते रहते हैं।
35मैं प्रेम-प्रीति लगाकर एकाग्रचित होकर अपने स्वामी का ध्यान करती रहती हूँ।
36अपने हाथ जोड़कर मैं प्रभु से विनती करती हूँ कि मुझे हरि-यश रूपी लाभ प्राप्त हो।
37नानक विनती करता है कि हे अगम्य-अथाह प्रभु ! मैं तेरा दास हूँ॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं