सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 843 · Raag Bilaaval · Guru Amar Daas Ji

1मनमुखी जीव अपना अमूल्य जीवन गंवा कर मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

2यदि वे सतगुरु की सेवा करें तो उनका भ्रम दूर हो जाता है और

3अपने शरीर रूपी घर में ही सत्य को पा लेते हैं।॥ ९ ॥

4पूर्ण परमेश्वर जो करता है, वही होता है।

5यह तिथियाँ एवं वार द्वैतभाव पैदा करते हैं।

6सतगुरु के बिना जगत् में घोर अन्धेरा बना रहता है।

7मूर्ख गंवार व्यक्ति ही तिथियों एवं वारों को मानते हैं।

8हे नानक ! जो गुरुमुख बनकर ज्ञान प्राप्त करता है, उसे सूझ हो जाती है और

9वह सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है॥ १० ॥ २ ॥

10बिलावलु महला १ छंत दखणी

11ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

12जीव रूपी नववधू मुग्धा इस जगत् रूपी चरागाह में थोड़े दिनों के लिए आई है।

13उसने दूध से भरी हुई मटकीं को सिर से उतार कर परमात्मा में लगन लगा ली है।

14उसने परमात्मा में लगन लगाकर सहज ही शब्द का श्रृंगार कर लिया है।

15वह हाथ जोड़ कर गुरु से विनती करती है कि मुझे सच्चे प्रियतम से मिला दो।

16उसने भक्ति भावना द्वारा प्रियतम को देखकर काम-क्रोध को दूर कर दिया है।

17हे नानक ! उस सुन्दर नववधू मुग्धा ने प्रेियतम को देखकर श्रद्धा धारण कर ली है॥ १॥

18हे नववधू जीव-स्त्री ! सत्य द्वारा यौवन में भी भोलीभाली बनी रहो।

19अपने पति के संग बनी रहो और कहीं ओर न आओ और न जाओं।

20अपने प्रभु की दासी बनकर उसके साथ ही रहो। मुझे तो हरि की भक्ति अच्छी लगती है।

21मैं उसका कथन करती हूँ, जिसका ज्ञान अथाह एवं अकथनीय है, मैं सहज ही प्रभु का गुणगान करती रहती हूँ।

22राम का नाम रसों का सागर है। वह रसिया उससे ही रमण करता है, जो सत्य से प्रेम करती है।

23हे नानक ! जिसे गुरु ने शब्द दान किया है, वही विचारवान् बना है॥ २॥

24प्रभु के मोह में मुग्ध हुई जीव-स्त्री उसका ही संग प्राप्त करती है।

25गुरु की रज़ानुसार चलने वाली जीव-स्त्री सत्य के संग ही मिल जाती है।

26अपनी सखी-सहेलियों के साथ वह सत्य में ही लीन रहती है और परमात्मा का ही संयोग प्राप्त करती है।

27एक मन होने से प्रेम द्वारा प्रभु का नाम मन में बस गया है और सतगुरु ने परमात्मा से मिला दिया है।

28उस निरंजन को हर धड़कन से स्मरण करती हूँ और वह दिन-रात एक घड़ी और एक पल के लिए भी नहीं भूलता।

29हे नानक ! मन रूपी दीपक में शब्द की ज्योति प्रज्वलित की है, जो सारे भय नाश करने वाली है॥ ३॥

30हे सखी! जिसकी ज्योति तीनों लोकों में फैली हुई है।

31वह अदृष्ट, अपार परमात्मा हरेक शरीर में बसा हुआ है।

32उस अदृष्ट, अपरंपार, सच्चे परमेश्वर से अहंत्व का नाश करके ही मिला जाता है।

33अपने अहम्, ममता एवं लोभ को जला दो और शब्द द्वारा मन की मैल दूर कर दी।

34श्रद्धा से उसके द्वार जाकर उसके दर्शन करो। हे तारणहार ! इस संसार-सागर से तार दो।

35हे नानक ! जिसने हरेि को हृदय में बसा लिया है, वह हरि का नामामृत चखकर तृप्त हो गया है॥ ४॥ १ ॥

36बिलावलु महला १ ॥

37हे सखी ! मेरे मन में बड़ा चाव उत्पन्न हो गया है, मैं सत्य द्वारा खिली रहती हूँ।

38अविनाशी प्रभु के प्रेम ने मुझे मोह लिया है।

39अटल परमात्मा नाथों का नाथ है, जो उसे भाता है, वही होता है।

40हे दाता ! तू सदैव कृपालु एवं दयालु है और सब जीवों के अन्दर तू ही जीवन रूप में है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं