गुरु ग्रंथ साहिब 842 · Raag Bilaaval · Guru Amar Daas Ji
1तू सुखदाता है और स्वयं ही अपने साथ मिला लेता है।
2एक परमात्मा के अलावा अन्य कोई नहीं।
3गुरुमुख ही इस तथ्य को बूझता है और उसे इस तथ्य की सूझ हो जाती है। ९ ॥
4जैसे पन्द्रह तिथियाँ, सात वार,
5बारह महीने, छ: ऋतुएँ और दिन-रात पुनः पुन आते रहते हैं,
6वैसे ही यह संसार है।
7करतार ने जीवों के लिए आवागमन बनाया हुआ है।
8वह सदैव शाश्वत, निश्चल है और उसकी शक्ति भरपूर है।
9हे नानक ! कोई गुरुमुख ही शब्द के चिंतन द्वारा इस तथ्य को बूझता है॥ १० ॥ १॥
10बिलावलु महला ३ ॥
11आदिपुरुष स्वयं ही सृष्टि-रचना करता है और
12सब जीवों को उसने माया-मोह में लगाया हुआ है।
13द्वैतभाव द्वारा जीव जगत् प्रपंच में लगे हुए हैं।
14इस तरह भाग्यहीन जीव जगत् में आते जाते और मरते रहते हैं।
15लेकिन सतगुरु से साक्षात्कार होने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है और
16जीव जगत्-प्रपंच से छूटकर सत्य में विलीन हो जाता है।॥ १॥
17जिसके भाग्य में लिखा हुआ है,
18उसके मन में एक प्रभु बस गया है॥ १॥ रहाउ॥
19हे प्रभु ! सृष्टि को पैदा करके तू स्वयं ही सबकी देखभाल करता है।
20तेरे विधान को कोई भी मिटा नहीं सकता।
21यदि कोई खुद को बड़ा सिद्ध या साधक कहता अथवा कहलाता है,
22वह भी भ्रमों में भूलकर जन्मता-मरता रहता है।
23जो व्यक्ति सतगुरु की सेवा करता है, उसे ज्ञान हो जाता है।
24यदि वह अहंत्व को समाप्त कर दे तो उसे अपने द्वार की सूझ हो जाती हैIl २॥
25एक परमात्मा से यह दूसरा सब उत्पन्न हुआ है।
26एक वही सर्वव्यापक है, अन्य कोई नहीं।
27यदि कोई इस दूसरे (जग) को त्याग कर एक परमात्मा को जान ले,
28तो वह गुरु के शब्द द्वारा उसके द्वार पर परवाना लेकर पहुँच जाता है।
29यदि सतगुरु मिल जाए तो ईश्वर प्राप्त हो जाता है और
30मन में द्वैतभाव को रोका जा सकता है॥ ३॥
31जिसका मालिक ताकतवर है,
32उसे कोई मार नहीं सकता।
33वह सेवक अपने मालिक की शरण में पड़ा रहता है और
34वह स्वयं ही सेवक को बड़ाई प्रदान करता है।
35मालिक से बड़ा अन्य कोई नहीं।
36कौन डरता है ? उसे किस का डर है।॥ ४॥
37गुरु मतानुसार रहने से शरीर में शान्ति पैदा हो जाती है।
38शब्द को पहचान कर फिर कोई पीड़ा नहीं लगती।
39वह जन्म-मरण से छूट जाता है और उसे कोई दुख नहीं लगता।
40नाम में लीन होकर वह सहज ही समाया रहता है।
41हे नानक ! गुरुमुख परमात्मा को अपने पास ही देखता है।
42सच तो यही है कि मेरा प्रभु सदैव सर्वव्यापक है॥ ५॥
43कोई सेवक बना हुआ है और कोई भ्रमो में भटका हुआ है।
44ईश्वर स्वयं ही सब करता और करवाता है।
45परमात्मा सबमें व्याप्त है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं।
46मन में रोष तो ही करो यदि कोई दूसरा हो।
47सतगुरु की सेवा ही अच्छा आचरण है।
48सत्य के द्वार पर इन कर्मशीलों को सत्यवादी माना जाता है॥ ६॥
49सब तिथियों एवं वार शब्द से ही सुन्दर लगते हैं।
50सतगुरु की सेवा करने से फल प्राप्त होता है।
51यह तिथियाँ एवं वार आते-जाते रहते हैं।
52लेकिन गुरु के शब्द द्वारा जीव निश्चल होकर सत्य में ही विलीन हो जाता है।
53तिथियों एवं वार तभी शुम होते हैं, जब जीव सत्य में लीन रहे।
54परमात्मा के नाम बिना सब नाशवान जीव योनियों में भटकते रहते हैं।॥ ७॥
55जब मनमुखी जीव मरते हैं तो उनकी मुक्ति नहीं होती।
56वे परमात्मा को याद नहीं करते अपितु द्वैतभाव में ही फॅसे रहते हैं।
57चेतनाहीन जीव को अज्ञान का अँधेरा बना रहता है।
58शब्द के बिना वह कैसे पार हो सकता है?
59पैदा करने वाले परमात्मा ने ही सब को पैदा किया है
60और स्वयं ही गुरु का ज्ञान रचा है॥ ८ ॥
61वेषधारी अनेक वेष धारण करते रहते हैं।
62वे कच्चे पॉसे की तरह भटकते रहते हैं।
63उन्हें न ही इहलोक में सुख मिलता है और न ही परलोक में सुख उपलव्ध होता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं