गुरु ग्रंथ साहिब 840 · Raag Bilaaval · Guru Nanak Dev Ji
1यह समूचा जगत् जगन्माता के पुत्र समान है।
2मेरा उस परमात्मा को शत्-शत् नमन है, जो प्रारम्भ से ही सबका रखवाला है।
3वह युग -युगांतरों से है, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी उसका ही अस्तित्व होगा।
4वह अपरंपार है और सबकुछ करने में समर्थ है॥ ११॥
5दसमी-नाम जपो, दान करो शरीर की शुद्धता के लिए स्नान करो।
6सत्य के गुणों का ज्ञान प्राप्त करना नित्य स्नान करना है।
7सत्य-नाम का सिमरन करने से मन विकारों की मैल नहीं लगती और भ्रम एवं भय दूर हो जाता है।
8कच्चे धागे को टूटते कोई देर नहीं होती।
9जगत् को ऐसे ही जानो जैसे कच्चा धागा है।
10अपना चित स्थिर करने के लिए के रंग में लीन रहो ॥ १२ ॥
11एकादशी-जो व्यक्ति परमात्मा को हृदय में बसाता है,
12अपने मन से हिंसा, ममता एवं मोह को दूर कर देता है,
13उसे इस व्रत का यही फल मिलता है कि वह अपनी अन्तरात्मा को पहचान लेता है।
14पाखण्ड में लीन होकर मनुष्य परमतत्व को नहीं देख सकता।
15एक वही निर्मल, निराहार एवं वासना रहित है और
16उस शुद्ध एवं सत्यस्वरुप को विकारों की कोई मैल नहीं लगती॥ १३॥
17मैं जिधर भी देखता हूँ, एक परमात्मा ही मौजूद है।
18उसने भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक जीव पैदा किए हुए हैं।
19फलों का आहार करने से मनुष्य को कोई फल नहीं मिलता।
20वह अनेक स्वादों को ग्रहण करता है, जो उसके व्रत का स्वाद गंवा देते हैं।
21वह झूठे लालच में ही फंसा रहता है।
22लेकिन वह तभी छूटता है, जब गुरु के माध्यम से सत्य की साधना करता है॥ १४॥
23द्वादशी-अवधूत वही है, जिसका मन व्यर्थ की बारह मुद्राओं से पृथक हो गया है।
24वह दिन-रात जागता रहता है और मोह-माया की नींद में नहीं सोता तथा
25परमात्मा में ही ध्यान लगाकर रखता है।
26जो गुरु पर श्रद्धा रखता है, उसे काल भी नहीं खाता।
27जिन्होंने कामादिक विकारों को समाप्त कर लिया है, वह त्यागी है।
28नानक विनती करता है कि उसने ही परमात्मा में वृति लगाई है॥ १५॥
29द्वादशी-जीवों पर दया एवं दान करना चाहिए।
30भटकते मन को नियंत्रण में करना चाहिए।
31जो निष्काम रहता है, उस व्रत रखने वाले का ही सच्चा व्रत है।
32अपने मुख से नाम का अजपा जाप जपते रहना चाहिए।
33तीनों लोकों में एक परमात्मा को ही जानो।
34जो सत्य को पहचान लेता है, वही शुद्धिकरण एवं संयम के सारे उद्यम कर रहा है॥ १६ ॥
35त्रयोदशी- मानव जीवन समुद्र के किनारे खड़े वृक्ष जैसा है। जैसे समुद्र की लहर उसे किसी भी वक्त उखाड़ सकती है, वैसे ही मृत्यु किसी भी समय खत्म कर सकती है।
36शरीर का मूल भाव जड़ मन है और उसका शिखर दसम द्वार है। परमात्मा का नाम अमृत है। शरीर का मूल मन अमृत नाम द्वारा जीव को पार करवा देता है।
37यदि कोई प्रभु-डर से डरकर मरता है, वह भवसागर में नहीं डूबता।
38जो परमात्मा से नहीं डरता, वह भवसागर में डूबकर अपनी प्रतिष्ठा गंवा देता है।
39जो प्रभु-डर में रहने को अपना घर समझता है, वह हृदय-धर में प्रभु का डर मानता है।
40वह ईश्वर के चरणों में निवास पा लेता है और उसे सत्य ही भाता है।१७॥
41चतुर्दशी-जब मनुष्य तुरीयावस्था प्राप्त कर लेता है तो
42रजो, तमो एवं सतोगुण काल में ही समा जाते हैं और
43चन्द्रमा के घर में सूर्य समा जाता है।
44वह मनुष्य योग-भक्ति का मूल्य पा लेता है।
45जो परमात्मा चौदह लोकों, पातालों, खण्डों-ब्रह्माण्डों में समाया हुआ है ऐसा मनुष्य उस परमात्मा में लगन लगाकर रखता है ।॥ १८ ॥
46अमावस्या-अमावस्या की रात्रि को चन्द्रमा आसमान में लुप्त रहता है।
47हे ज्ञानी ! इस तथ्य को शब्द के चिन्तन द्वारा समझो।
48जैसे चांद गगन में होता है लेकेिन उसका आलोक तीनों लोकों में होता है।
49वैसे ही परमात्मा की ज्योति सब में समाई हुई है वह रचयिता सृष्टि-रचना कर करके उसकी देखभाल करता रहता है।
50जो गुरु द्वारा इसे समझता है वह उसी में समां जाता है
51लेकिन स्वेच्छाचारी जीव भ्रम में फॅसकर जन्मते-मरते रहते हैं।॥ १९ ॥
52जो व्यक्ति प्रभु चरणों में स्थाई निवास बना लेता है,
53वह आत्मस्वरूप को पहचान कर सतगुरु को पा लेता है।
54जिसकी सब अभिलाषाएँ मिट जाती हैं,
55उसके मन की दुविधा एवं लालसा वाला हृदय रूपी बर्तन भी फूट जाता है।
56उसका मन ममता जाल से दूर रहता है। नानक प्रार्थना करता है कि हम उस जीव के दास हैं ॥ २० ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं