सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 83 · Siree Raag

1ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

2सिरीराग की वार महला ४ श्लोकों साथ ॥

3श्लोक महला ३ ॥

4रागों में श्री राग तभी सर्वोत्तम राग है, यदि इसके द्वारा प्राणी का सत्य-परमेश्वर से प्रेम हो जाए।

5फिर मन में हमेशा ही सत्य प्रभु निवास करता है और प्राणी की बुद्धि अपार प्रभु में स्थिर होती है।

6गुरु के शब्द का चिंतन करने से प्राणी नाम रूपी अमूल्य रत्न को प्राप्त कर लेता है।

7नाम-सिमरन करने से मनुष्य की जिव्हा एवं मन सत्य हो जाते हैं और उसका शरीर एवं आकार भी सत्य हो जाता है।

8हे नानक ! नाम का सत्य व्यापार हमेशा सत्य के पुंज सतिगुरु की सेवा करने से ही होता है ॥१॥

9महला ३ ॥

10जब तक प्रभु से सच्चा प्यार नहीं होता, मनुष्य की शेष प्रीति निरर्थक है।

11मन को माया ने मोहित कर रखा है, इसलिए वह प्रभु को देखता-सुनता ही नहीं।

12पति-परमेश्वर के दर्शन के बिना प्रेम उत्पन्न नहीं होता। अंधा अर्थात ज्ञानहीन आदमी क्या कर सकता है?

13हे नानक ! जिस प्रभु ने मनुष्य को नेत्रहीन (ज्ञानहीन) किया है, वही उसे ज्ञान रूपी नेत्र दे भी सकता है ॥२॥

14पउड़ी ॥

15एक ईश्वर ही समस्त जीवों का रचयिता है और एक ही ईश्वर का दरबार है।

16एक ईश्वर का ही आदेश सब पर चल रहा है और तुम एक ईश्वर को उपने हृदय में धारण करो।

17उस स्वामी के अलावा अन्य कोई नहीं, तुम अपना डर, संदेह तथा भय निवृत कर दो।

18उस हरि की ही स्तुति करो, जो तेरे घर के अन्दर व बाहर रक्षा करता है।

19ईश्वर जिस पर दयालु होता है, वह प्रभु का भजन करने से भय के विकराल सागर से पार हो जाता है ॥ १ ॥

20श्लोक महला १॥

21समस्त नियामतें उस भगवान की दी हुई हैं, उसके साथ कोई बल नहीं चल सकता है?

22कई प्राणी जागते हुए भी उससे नियामतें प्राप्त नहीं कर सकते और कई प्राणियों को वह नींद से जगाकर नियामतें देता है ॥१॥

23महला १॥

24विश्वास एवं संतोष धैर्यशालियों के गुण हैं और सहनशीलता फरिश्तों का यात्रा-व्यय हैं।

25ऐसे व्यक्ति पूर्ण प्रभु के दर्शन कर लेते हैं परन्तु दोषियों को कहीं भी स्थान नहीं मिलता ॥२॥

26पउड़ी ॥

27हे प्रभु ! इस दुनिया की रचना आपने की है और स्वयं ही तुमने दुनिया को अलग-अलग धंधों में लगाया है।

28अपनी महानता को देखकर तुम स्वयं ही प्रसन्न होते हो।

29मेरे प्रभु तेरे अलावा अन्य कुछ भी नहीं। तुम सच्चे मालिक हो।

30तुम स्वयं ही सर्वत्र व्यापक हो।

31हे संतजनो ! आप उस परमेश्वर की उपासना करो, जो अंतिम समय तुम्हें मुक्ति प्रदान करेगा। ॥२॥

32श्लोक महला १॥

33ऊँची जाति एवं नाम का अहंकार व्यर्थ है।

34समस्त जीवों में एक ही ईश्वर रूपी वृक्ष की छाया का सुख उपलब्ध है।

35हे नानक ! यदि कोई व्यक्ति स्वयं को अच्छा कहलवाता है

36तों उसे तभी अच्छा जाना जाएगा, यदि उसका सम्मान प्रभु के दरबार में स्वीकृत होगा ॥१॥

37महला २॥

38जिस प्रियतम से प्रेम होता है, उसके समाने जगत् से प्राण त्याग कर चले जाना बेहतर है।

39प्रियतम के पश्चात् जीना संसार में धिक्कार का जीवन व्यतीत करना है ॥२ ॥

40पउड़ी।

41हे प्रभु ! तूने स्वयं इस धरती की रचना की है, चाँद एवं सूर्य ये दो दीपक बनाए हैं। |

42तुम्हीं ने इस ब्रह्माण्ड में चौदह पुरियों की रचना की है, जहाँ पर प्राणियों के कर्मों का व्यापार होता है।

43जो प्राणी गुरमुख हो जाते हैं, ईश्वर उन्हें मोक्ष-रूपी लाभ प्रदान करता है।

44जो सत्य नाम के अमृत का पान करते हैं, उन्हें यमदूत नहीं पकड़ते।

45ऐसे ईश्वर से स्नेह करने वाले प्राणी स्वयं भी मुक्त होते हैं और उनका परिवार भी बच जाता है तथा जो उनके पीछे चलता है, वह भी बच जाता है ॥३॥

46श्लोक महला १॥

47भगवान अपनी कुदरत की रचना करके स्वयं ही इसमें निवास कर रहा है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं