गुरु ग्रंथ साहिब 837 · Raag Bilaaval · Guru Raam Daas Ji
1हृदय रूपी सेज एक ही है और एक ठाकुर प्रभु ही उस पर आ बसता है लेकिन मनमुखी जीव भ्रमों में ही भटकता रहता है और उसे आत्मस्वरूप नहीं मिलता।
2जो ‘गुरु-गुरु' करता हुआ उसकी शरण में आता है, उसे वह प्रभु से मिला देता है और क्षण भर के लिए भी विलम्ब नहीं करता ॥ ५ ॥
3यदि कोई मनुष्य धर्म-कर्म करके कर्मकाण्ड में वृद्धि करता जाए तो उसके मन में पाखण्ड, लोभ, कपट वाले कर्म ही टिके रहेंगे।
4अगर वेश्या के घर पुत्र पैदा हो गया है, तो उसके पिता का कोई नाम नहीं बताया जा सकता ॥ ६ ॥
5जो जीव पूर्व जन्म भक्ति करके इस जन्म में आया है, गुरु ने उसके मन में हरि की भक्ति का मंत्र पैदा कर दिया है।
6जब भक्ति करके परमात्मा को पा लिया, तो वह हरि-नाम में ही विलीन हो गया ॥ ७ ॥
7प्रभु ने स्वयं लाकर भक्ति रूपी मेहंदी पीसी है और स्वयं ही घोलकर भक्तों के अंगों पर लगाई है।
8हे नानक ! जिन पर ठाकुर जी ने अपनी कृपा की है, उसने उनकी बाँह पकड़कर भवसागर में से निकाल लिया है॥ ८ ॥ ६ ॥ २ll १॥ ६॥ ६ ॥
9रागु बिलावलु महला ५ असटपदी घरु १२
10ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
11मेरे प्रभु की उपमा कही नहीं जा सकती,
12अतः सब कुछ छोड़कर उसकी ही शरण ले ली है॥ १॥ रहाउ॥
13प्रभु के चरण कमल अपार हैं,
14मैं सदैव उन पर कुर्बान जाता हूँ।
15मेरे मन में उससे प्रीति लग चुकी है,
16उसे छोड़कर कहीं नहीं जाता ॥ १॥
17मैं जिव्हा से हरि-नाम कहता रहता हूँ,
18जिससे सारे पापों एवं दोषों की मैल जल गई है।
19संतों की नाव पर चढ़कर मेरा उद्धार हो गया है और
20भवसागर से पार हो गया हूँ॥ २॥
21संतों का मन प्रभु के प्रेम एवं प्रीति की डोर से बंधा होता है
22यह संतों की निर्मल मर्यादा है
23पाप एवं विकार उनका साथ छोड़ गए हैं और
24उन्हें निराकार प्रभु मिल गया है॥ ३॥
25प्रभु के दर्शन करके बड़ा आश्चर्य होता है और
26पूर्ण आनंद का स्वाद चखने को मिलता है।
27इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता
28जब प्रभु चित्त में बस जाता है ॥ ४॥
29उनका नरक में निवास नहीं होता, जो नित्य गुणों के भण्डार प्रभु का चिंतन करते रहते हैं, ।
30वे यमों को अपनी ऑखों से देखते भी नहीं और अनहद शब्द की ध्वनि से मुग्ध हो जाते हैं॥ ५॥
31शूरवीर परमेश्वर की शरण में ही पड़े रहना चाहिए
32दयालु प्रभु अपने भक्तों के वश में है।
33वेद हरि का भेद नहीं पा सकते और
34मुनिजन भी नित्य उसकी भक्ति करते रहते हैं।६॥
35परमात्मा दीनों के दुख-दर्द दूर करने वाला है,
36उसकी भक्ति बड़ी कठिन है।
37उसका विस्तार कोई नहीं जानता,
38जो जल, धरती, आकाश, सब में समाया हुआ है॥ ७ ॥
39मैं लाख बार प्रभु की ही वन्दना करता हूँ
40और हार कर प्रभु-दरबार में आ पड़ा हूँ ।
41हे प्रभु जी ! मुझे साधु की धूलि बना दो और
42नानक की यह अभिलाषा पूरी कर दो ॥ ८॥१॥
43बिलावलु महला ५ ॥
44हे प्रभु ! मेरा जन्म-मरण मिटा दो,
45मैं हार कर तेरे द्वार पर आ गया हूँ।
46मैं साधु के चरण पकड़ कर उसके साथ ही रहता हूँ और
47मन को हरि-रंग ही मीठा लगता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं