सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 835 · Raag Bilaaval · Guru Raam Daas Ji

1में हरि-चरणों को अपने मन में बसाकर तथा पैर स्वरताल में टिका कर हरि की स्तुति करता रहता हूँ॥ ५॥

2यह मन हरि के रंग में लीन होकर उसका ही गुणगान करता है और रसों के रस शब्द का जाप किया है।

3अन्तरात्मा में अमृत की निर्मल धारा बहती रहती है। जिसने इस अमृत का पान किया है, उसे ही सुख मिला है॥ ६॥

4अभिमानी व्यक्ति मन के हठ से कर्म करता है परन्तु उसके यह कर्म ऐसे हैं जैसे बालक ने रेत का घर बनाया है,

5जब समुद्र-सागर की लहर आती है तो यह क्षण में ही भिन्न-भिन्न होकर गिर जाता है।७ ।

6हरि ही सरोवर एवं सागर है और उसने स्वयं ही यह जगत् रूपी खेल बनाया है।

7हे नानक ! जैसे जल की तरंगें जल ही होती हैं और जल में ही मिल जाती हैं, वैसे ही प्रभु सब में समाया हुआ है॥ ८॥ ३॥ ६॥

8बिलावलु महला ४ ॥

9सतगुरु प्रसन्न हो जाए, इसलिए मन में ज्ञान रूपी मुद्राएँ धारण की हैं और गुरु का शब्द तन में भस्म रूप में लगा लिया है।

10साधु की संगति में रहकर जन्म-मरण दोनों मिट गया है और यह शरीर अमर हो गया है॥ १॥

11हे मेरे मन ! सदैव साधुओं की संगति में मिलकर रहना चाहिए।

12हे मधुसूदन, हे माधो ! ऐसी कृपा करो कि मैं क्षण-क्षण साधु के चरण धोता रहूँ॥१॥ रहाउ ॥

13जो व्यक्ति गृहस्थ को तजकर वनवासी बन जाता है, उसका मन एक क्षण के लिए भी नहीं टिकता।

14जब वह साधु की शरण में आता है तो उसका भटकता हुआ मन टिक जाता है॥ २॥

15जो अपने पुत्र -पुत्रियों को छोड़कर सन्यासी बन जाता है, उसके मन में अनेक आशाएँ पैदा होती रहती हैं।

16वह इस तथ्य को नहीं बूझता कि गुरु के शब्द द्वारा आशा रहित होकर ही सुख उपलब्ध है॥ ३॥

17कोई नागा साधु तो बन जाता है परन्तु उसके मन में तर्क वितर्क पैदा होता रहता मन दसों दिशाओं में भटकता रहता है।

18वह धरती पर भटकता रहता है लेकिन उसकी त्रिष्णा नहीं मिटती। लेकिन साधु की संगति में मिलकर उसे दया का घर मिल जाता है॥ ४॥

19कोई व्यक्ति आसन लगाकर सिद्धियों सीखने का प्रयत्न करता है और अपने मन में ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ जादुई शक्तियों की चाह करता रहता है।

20इससे न उसे तृप्ति होती है, न संतोष मिलता है न ही मन को शान्ति आती है। परन्तु साधु को मिलकर हरि-नाम द्वारा उसे तृप्ति हो जाती और सर्वसिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं। ५॥

21अण्डज, जेरज, स्वेदज, उदभिज-सब प्रकार के जीव जन्तु परमात्मा ने पैदा किए हुए हैं।

22चाहे क्षत्रिय, ब्राहाण, शूद्र, वैश्य अथवा चाण्डाल हो, जो साधु की शरण में आता है, उसका उद्धार हो जाता है।॥ ६॥

23नामदेव, जयदेव, कबीर, त्रिलोचन निम्न.जाति का चमार रविदास जो चमार का काम करता था,

24धन्ना जाट एवं सैण नाई जो संत-गुरु की संगति में मिला है, वह धन्य हो गया है और उसे दयालु परमात्मा मिल गया है॥ ७ ॥

25भक्तवत्सल हरिं ने सदैव ही संतजनों की लाज रखी है और उसने हमेशा अपने भक्तों का साथ दिया है।

26हे नानक ! जो भी जगत् के जीवन परमात्मा की शरण में आया है, उसने कृपा करके उसकी रक्षा की है॥ ८ ॥ ४॥ ७ ॥

27बिलावलु महला ४ ॥

28गुरु के वचन को सुनकर मन में ऐसा तीर लगा कि अन्तर्मन में प्रभु-मिलन की तीव्र लालसा पैदा हो गई।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं