सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 829 · Raag Bilaaval

1बिलावलु महला ५ ॥

2हे स्वामी प्रभु ! अपने सेवक को कभी न भुलाओ,

3मेरे हृदय से लगे रहो। हे गोविन्द ! मेरी पूर्व प्रीति का ख्याल करो।॥ १॥ रहाउ॥

4हे प्रभु ! तेरा विरद् पतितों को पावन करना है, इसलिए मेरे दोषों को हृदय में मत रखना।

5हे श्री हरि ! तू ही मेरा जीवन, प्राण, धन एवं सुख है, कृपा करके मेरे अहंत्व का पद जला दो ॥ १॥

6जैसे जल के बिना मछली एवं दूध के बिना शिशु का जीना असंभव है।

7हे स्वामी ! वैसे ही नानक को तेरे चरणों की प्यास लगी हुई हैं और तेरे दर्शन करके ही उसे परम सुख उपलब्ध होता है॥ २॥ ७ ॥ १२३॥

8बिलावलु महला ५ ॥

9मेरा परलोक एवं इहलोक सुखदायक हो गया है,

10परब्रह्म-प्रभु ने मुझ पर दया की है और पूर्ण गुरु ने पूर्णतया मेरी लाज रख ली है॥ १॥ रहाउ॥

11मेरा प्रियतम हरि मेरे मन-तन में वास कर रहा है, इसलिए सारा दुख-दर्द मिट गया है।

12भगवान् का गुणगान करने से मन में शांति एवं सहज आनंद हो गया है और काम, क्रोध इत्यादि सारे दुष्ट दूत नाश हो गए हैं। १॥

13प्रभु ने मेरे गुण अवगुण का कुछ भी विचार नहीं किया और कृपा कर मुझे अपना बना लिया है।

14अटल, अविनाशी परमात्मा की महिमा अतुलनीय है और नानक तो उस हरि की जय-जयकार करता रहता है॥ २ ॥ ८ ॥ १२४ll

15बिलावलु महला ५ ॥

16निष्ठा रूपी भय एवं भक्ति के बिना कैसे भवसागर से पार हुआ जा सकता है ?

17हे पतितों के उद्धारक ! अनुग्रह करो; हे स्वामी ! मुझे तुझ पर ही भरोसा है॥ १॥ रहाउ ॥

18जिस जीव को तेरा सिमरन करना नहीं आता, वह विकारों के नशे में ऐसे फिरता है, जैसे लोभी कुत्ता फिरता रहता है।

19उसकी जीवन-अवधि अधिकतर मोह में ही बीतती जा रही है और पाप करते ही वह डूबता जा रहा है। १॥

20हे दुखनाशक, हे निरंजन ! मैं तेरी शरण में आया हूँ, जैसे हो सके साधुओं की संगति में मिला दो।

21हे प्रभु ! तू सब क्लेश नाश करने वाला एवं सब पाप मिटाने वाला है। नानक तेरे दर्शन करके ही जीवन पा रहा है॥ २ ॥ ६ ॥ १२५ ॥

22रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ९

23ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

24हे ईश्वर ! तूने स्वयं ही हमें अपने साथ मिला लिया है

25जब से हम तेरी शरण में आए हैं, तब से हमारे सब दोष दूर हो गए हैं और ॥ १ ॥ रहाउ ॥

26अपना अभिमान और पराई चिंता को तजकर साधुओं की शरण में आ गए हैं।

27हे मेरे प्रियतम ! तेरा नाम जप-जपकर तन से सब रोग नष्ट हो गए हैं।॥ १॥

28तूने अपनी कृपा करके बड़े-बड़े महामूखों, नासमझ एवं अज्ञानियों को भी बचा लिया है।

29हे नानक ! पूर्ण गुरु से साक्षात्कार होने से हमारा आवागमन मिट गया है॥ २॥ १॥ १२६॥

30बिलावलु महला ५ ॥

31मैं तो नाम सुनकर ही जीता हूँ।

32जब पूर्ण गुरु सुप्रसन्न हो गया तो मेरी सब कामनाएँ पूरी हो गई॥ १॥ रहाउ ॥

33मेरी पीड़ा दूर हो गई है, मन को धीरज हो गया है और अनहद ध्वनि ने मुझे मोह लिया है।

34मेरे मन में प्रियतम प्रभु के मिलन का चाव उत्पन्न हो गया है और उसके बिना एक क्षण के लिए भी मुझसे रहा नहीं जाता॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं