गुरु ग्रंथ साहिब 828 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1हे गोविंद ! तू समर्थ एवं सर्वकर्ता है,
2मेरे अवगुण ढंक ले, मैं अपराधी तेरे चरणों की शरण में आया हूँ॥ १ ॥ रहाउ ॥
3जो कुछ भी मैंने किया है, उसे तूने देख जान लिया है और मुझ ढीठ को मुकरने के लिए भी कोई राह नहीं।
4हे प्रभु ! मैंने सुना है कि सारे जगत् में तेरा बड़ा प्रताप है और तेरा नाम करोड़ों पापों को नाश कर देता है॥ १ ॥
5मेरा स्वभाव है कि मैं सदैव गलतियाँ करता रहता हूँ और तेरा धर्म पतितों का उद्धार करना है।
6नानक विनती करता है कि हे करुणामय, हे कृपालु, हे कृपानिधि, हे श्री हरि ! तेरे दर्शन ही जीवन देने वाले हैं।॥ २॥ २॥ ११८॥
7बिलावलु महला ५ ॥
8हे ईश्वर ! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि
9मेरा माथा संतों के चरणों में पड़ा रहे, यह आँखें उनके दर्शन करें और तन पर उनकी चरण-धूलि पड़ी रहे॥ १॥ रहाउ॥
10गुरु का शब्द मेरे हृदय में बसा रहे और मन हरि-नाम में लीन रहे।
11हे ठाकुर जी ! कामादिक पाँच तस्करों को मुझ से दूर कर दो और सारे भ्रम आग में जला दो ॥ १ ॥
12जो कुछ तुम करो, उसे ही मैं भला मानूं और मेरी दुविधा एवं लालसा को दूर कर दो।
13हे प्रभु! तुम ही नानक के दाता हो, इसलिए संतों के संग मिलाकर मेरा उद्धार कर दो ॥ २ ॥ ३ ॥ ११६ ॥
14बिलावलु महला ५ ॥
15हे परमेश्वर ! तेरे संतजनों से ऐसी दीक्षा माँगता हूँ कि
16मैं तेरे ही ध्यान एवं तेरे ही रंग में लीन रहूँ।
17में तेरी ही भक्ति करता रहूँ और तेरे चरणों में ही लीन रहूँ॥ १॥ रहाउ॥
18संतों की टहल-सेवा, उनके साथ संभाषण, उनके साथ मेल-मिलाप एवं साथ सदैव बना रहे।
19उनकी चरणरज मेरे मुँह एवं माथे पर लग गई है, जिससे अनेक तरंगें पैदा करने वाली कामनाएँ पूरी हो गई हैं।॥ १ ॥
20परब्रह्म के संतजनों की महिमा इतनी पावन है कि उनके चरण ही गंगा की तरह करोड़ों तीर्थ स्थान हैं।
21हे नानक ! उनकी चरण-धूलि में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के कलंक दूर हो जाते हैं॥ २॥ ४॥ १२०॥
22बिलावलु महला ५ ॥
23जैसे तुझे भाता है, वैसे ही हमारा पालन-पोषण करो।
24हे परब्रहा परमेश्वर सतगुरु ! हम बालक हैं और तुम हमारे कृपालु पिता हो।॥ १॥ रहाउ॥
25मैं तो निर्गुण हूँ, मुझ में कोई गुण नहीं और मैं तेरी साधना तक पहुँच नहीं सकता।
26अपनी गति तुम ही जानते हो, यह जीवन, शरीर सबकुछ तेरी संपति है॥ १॥
27हे अन्तर्यामी स्वामी ! बिना बोले ही तू सारा हाल जानता है।
28नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु जी ! यदि तेरी कृपा-दृष्टि हो जाए तो हमारा तन-मन शीतल शांत हो ॥२॥५॥१२१॥
29बिलावलु महला ५ ॥
30हे प्रभु ! मुझे सदैव अपने साथ रखो।
31तू ही मेरा प्रियतम, मनमोहन है और तेरे बिना पूरा जीवन ही बेकार है॥ १॥ रहाउ॥
32मेरा प्रभु अनाथों का नाथ है, यदि उसकी इच्छा हो तो वह क्षण में ही जीव को भिखारी से राजा बना देता है।
33वह जलती आग में भी हाथ रखकर भक्तों की रक्षा करता आया है॥ १॥
34भगवान का सिमरन करने से सब दुख दूर होते हैं, मन तृप्त एवं बड़ा सुख प्राप्त होता है।
35हे नानक ! सर्व निधियों के भण्डार परमात्मा की भक्ति करो, शेष सब चतुराईयाँ व्यर्थ हैं॥ २॥ ६ ॥ १२२ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं