गुरु ग्रंथ साहिब 826 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1हे नानक ! मैं तो दुखनाशक परमात्मा की शरण में ही आया हूँ और अन्तर्मन एवं बाहर उसे ही देखता हूँ॥ २ ॥ २२ ॥ १०८ ॥
2बिलावलु महला ५ ॥
3हे ईश्वर ! तेरे दर्शन करने से ही सारे दोष नाश हो जाते हैं।
4इसलिए तू कभी भी हमारी नजर से दूर मत होना और सदैव प्राणों के साथ बसे रहना ॥ १॥ रहाउ॥
5हे मेरे प्रियतम ! तू मेरे प्राणों का आधार है और तू ही मेरा स्वामी है।
6वह अन्तर्यामी प्रभु हर जगह बसा हुआ है।१॥
7मैं तेरे कौन-कौन से गुण स्मरण करके तेरा ध्यान करूँ।
8हे प्रभु! जीवन की हरेक साँस से तुझे ही याद करता रहता हूँ॥ २॥
9हे प्रभु ! तू कृपानिधि एवं दीनदयाल है,
10अपने जीवों का पालन-पोषण करो॥ ३॥
11यह सेवक आठ प्रहर तेरा ही नाम जपता रहता है।
12हे नानक ! प्रभु ने स्वयं ही अपनी प्रीति मेरे मन में लगाई है॥ ४ ॥ २३ ॥ १०६ ॥
13बिलावलु महला ५ ॥
14हे जीव ! तेरा तन, धन एवं यौवन चला गया है।
15मगर तूने राम-नाम का भजन नहीं किया और दिन-रात विकार करते ही बीत गए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
16नित्य अनेक प्रकार का भोजन खाते मुँह के दाँत भी घिस कर क्षीण हो गए हैं।
17‘मेरी-मेरी कर करके तू लुट गया है और पाप करते हुए तेरे मन में कभी दया नहीं आई॥ १॥
18हे प्राणी ! यह जगत् महाविकारों एवं दुखों का घोर सागर है, जिसमें तू डूबा हुआ है।
19हे नानक ! जो जीव स्वामी की शरण में पड़ गए हैं, प्रभु ने उन्हें बाँह से पकड़ कर दुखों के सागर से निकाल लिया है॥ २॥ २४॥ ११०॥
20बिलावलु महला ५ ॥
21हे मेरे सज्जनो ! जब अपना प्रभु याद आया तो
22मेरा कल्याण हो गया तथा मेरे दुष्ट दुश्मन व्यर्थ ही समय बर्बाद करते रहे॥ १॥ रहाउ॥
23जब करतार ने मेरा पक्ष लिया तो सब व्याधियाँ एवं मुसीबतें नाश हो गई।
24जब मैंने प्रियतम के नाम को अपने ह्रदय का हार बना लिया तो मन में सुख, शांति और बड़ा आनंद पैदा हो गया।॥ १॥
25हे प्रभु! मेरी जिंदगी, तन एवं धन सब तेरी ही दी हुई पूंजी है और तू ही मेरा समर्थ स्वामी है।
26तू ही अपने दास का रखवाला है और दास नानक सदैव तेरा चेला है॥ २॥ २५ ॥ १११ ॥
27बिलावलु महला ५ ॥
28गोविन्द का सिमरन करने से कल्याण हो गया है।
29उस अन्तर्यामी का भजन करने से सब मुसीबतें मिट गई हैं और सच्चा सुख प्राप्त हो गया है॥ १॥ रहाउ॥
30जिसके ये जीव पैदा किए हुए हैं, उसने ही उन्हें सुखी किया है तथा भक्तजनों को उसका ही सच्चा सहारा है।
31प्रभु ने स्वयं अपने भक्तों की लाज रखी है और वे तो भयनाशक परमात्मा पर ही गर्व करते हैं।॥ १॥
32भगवान ने चुन-चुनकर कामादिक दुष्ट दूतों को मन से निकाल दिया है और अब सबसे मित्रता हो गई है तथा सारी बुराई मिट गई है।
33हे नानक ! मैं तो भगवान के गुणों का बखान करके ही जी रहा हूँ और मन में सहज सुख एवं आनंद पैदा हो गया है॥ २॥ २६॥ ११२॥
34बिलावलु महला ५ ॥
35परब्रह्म प्रभु कृपालु हो गया है।
36सतगुरु ने सब कार्य संवार दिए हैं तथा नाम जप-जपकर साधुजन निहाल हो गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
37प्रभु ने अपने सेवक का पक्ष लिया है, जिससे उसके सारे दोषी मिट्टी में मिल गए हैं।
38उसने सेवक को गले से लगाकर रखा हुआ है और अपनी शरण में रखकर उसका उद्धार कर दिया है। १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं