गुरु ग्रंथ साहिब 825 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1दास नानक प्रार्थना करता है कि हे पूर्ण प्रभु दाता ! ऐसी कृपा करो कि मैं तेरा पावन यश करता रहूँ ॥ २॥ १७॥ १०३॥
2बिलावलु महला ५ ॥
3ईश्वर ने सुलही खाँ से हमें बचा लिया है।
4सुलही खाँ अपने मकसद में सफल नहीं हो सका अर्थात् वह हमें नुक्सान पहुँचाने में असफल रहा और बड़ी नापाक मौत का शिकार हुआ। ॥ १॥ रहाउ ॥
5ईश्वर ने कुठार निकाल कर उसका सिर काट दिया है और क्षण में ही वह खाक हो गया। वह हमारा बुरा सोचता-सोचता स्वयं ही जलकर मर गया है।
6जिस परमेश्वर ने उसे बनाया था, उसने ही उसे मौत के हवाले कर दिया है॥ १॥
7उसका कोई पुत्र, मित्र एवं धन कुछ भी नहीं रहा और वह अपने भाई-रिश्तेदार पीछे छोड़ गया है।
8हे नानक ! मैं उस प्रभु पर शत्-शत् बलिहारी हूँ, जिसने अपने सेवक का वाक्य पूरा किया है॥ २॥ १८ ॥ १०४॥
9बिलावलु महला ५ ॥
10पूर्ण गुरु की सेवा पूर्ण फलदायक है।
11जगत् का स्वामी स्वयं हर जगह मौजूद है और गुरुदेव ने हमारा हर कार्य सम्पूर्ण कर दिया है॥ १॥ रहाउ ॥
12स्वामी प्रभु ही आदि, मध्य एवं अन्त तक मौजूद है, उसने अपनी रचना स्वयं ही बनाई है।
13मेरे प्रभु का बड़ा प्रताप है कि वह अपने सेवक की हमेशा ही लाज रखता है॥ १॥
14परब्रह्म-परमेश्वर ही सतगुरु है, जिसने सब जीवों को अपने वश में किया हुआ है।
15हे नानक ! मैंने उसके चरणों की शरण ली है और निर्मल राम नाम रूपी मंत्र जपता रहता हूँ॥ २ ॥ १६॥ १०५ ॥
16बिलावलु महला ५ ॥
17परमात्मा स्वयं मुझे दुखों एवं पापों से बचाता है।
18गुरु के चरणों में लगकर मन शांत हो गया है और अपने हृदय में राम नाम का ही जाप करता रहता हूँ॥ १॥ रहाउ॥
19प्रभु ने कृपा कर मेरे सिर पर अपना हाथ रखा है, वह जगत् का उद्धार करने वाला है और धरती के नौ खण्डों में उसका ही प्रताप फैला हुआ है।
20मेरे सब दुख नाश हो गए हैं तथा सुख एवं आनंद मन में प्रवेश कर गए हैं। नाम जपकर तृष्णा बुझ गई है और मन-तन संतुष्ट हो गए हैं। १॥
21अनाथों का नाथ ईश्वर ही जीवों को शरण देने में समर्थ है और वही समूची सृष्टि का माता-पिता है।
22हे नानक ! मैं तो भक्तवत्सल, भयनाशक स्वामी का ही गुणगान करता हूँ और उसका ही नाम अलापता हूँ॥२॥ २०॥ १०६ ॥
23बिलावलु महला ५ ॥
24हे मानव ! जिससे तू पैदा हुआ है, उसे पहचान !
25परब्रहा-परमेश्वर का ध्यान-मनन करने से ही कुशलक्षेम एवं कल्याण होता है॥ १॥ रहाउ॥
26अहोभाग्य से ही पूर्ण गुरु मिलता है, वही अन्तर्यामी, बुद्धिमान एवं सर्वगुणसम्पन्न है।
27वह अपना बनाकर हाथ देकर रक्षा करता है। वह बड़ा समर्थ है और सम्मानहीनों को सम्मान दिलवाता है॥ १ ॥
28मेरे सारे भ्रम भय क्षण में ही नाश हो गए हैं और अज्ञान का अंधेरा मिटकर ज्ञान का प्रकाश हो गया है।
29हे नानक ! मैं तो जीवन की हरेक साँस से उसकी ही आराधना करता हूँ और सदैव उस पर कुर्बान जाता हूँ॥ २॥ २१॥ १०७॥
30बिलावलु महला ५ ॥
31शूरवीर गुरु ने इहलोक एवं परलोक दोनों स्थानों में हमारी रक्षा की है।
32परब्रह्म-परमेश्वर ने हमारा लोक-परलोक संवार दिया है और सभी कार्य पूरे हो गए हैं।॥ १॥रहाउ ॥
33हरि का नाम जपने से सुख प्राप्त हो गया है और साधुओं की चरण-धूलि में स्नान होता रहता है।
34अब आवागमन समाप्त हो गया है तथा जन्म-मरण के चक्र भी मिट गए हैं। १ ॥
35में भ्रम-भय के सागर से पार हो गया हूँ और मृत्यु के भय से भी छूट गया हूँ। एक परमात्मा ही घट-घट में भरपूर हो रहा है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं