गुरु ग्रंथ साहिब 824 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1मेरे प्रभु का सारी दुनिया में बड़ा प्रताप है, फिर कोई मनुष्य बेचारा मेरा क्या विगाड़ सकता है॥ १॥
2बारंबार भगवान् का सिमरन करके मुझे सुख उपलब्ध हो गया है, इसलिए उसके चरण-कमल को मन में बसा लिया है।
3दास नानक उस परमात्मा की शरण में पड़ा है, जिससे ऊपर कोई नहीं ॥ २ ॥ १२ ॥ ६८ ॥
4बिलावलु महला ५ ॥
5सर्वदा प्रभु का नाम जपना चाहिए,
6क्योंकि इससे बुढापा एवं मृत्यु का दुख कुछ भी प्रभावित नहीं करता और आगे सत्य के दरबार में कार्य पूर्ण हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
7अपना अहंत्व त्याग कर सदैव शरण में रहना चाहिए। यह नाम का भण्डार गुरु से प्राप्त होता है।
8इससे जन्म-मरण की फॉसी कट जाती है और सत्य के दरबार में जाने के लिए यह परवाना है॥ १॥
9हे ईश्वर ! जो तू करता है, मैं उसे सहर्ष भला मानता हूँ और मेरे मन से सारा घमण्ड छूट गया है।
10हे नानक ! में उस परमात्मा की शरण में हूँ, जिसने सारा जहान बनाया है॥ २॥ १३॥ ६६ ॥
11बिलावलु महला ५ ॥
12जिसके मन तन में प्रभु बसा हुआ है,
13वह नित्य उसका गुणगान करके दूसरों को सुनाने का परोपकार करता है, उसकी रसना का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता ॥ १॥ रहाउ॥
14उसकी सारी कुल का एक क्षण में ही उद्धार हो गया है और उसके जन्म-जन्मांतर की मैल दूर हो गई है।
15वह अपने प्रभु का सिमरन करके बड़े आनंद से विकारों से भरे वन रूपी जगत् से पार हो गया है॥ १॥
16वह प्रभु के चरण रूपी जहाज को पाकर भवसागर से पार हो गया है।
17हे नानक ! जिस भगवान् की भक्ति में अनेक संत, महापुरुष एवं भक्तजन लीन हैं, उसका मन भी उससे ही लगा है ॥२॥१४॥१००॥
18बिलावलु महला ५ ॥
19हे परमेश्वर ! तेरी लीला देखकर मुझे बड़ा धैर्य होता है।
20तू ही अन्तर्यामी स्वामी है और तू ही साधुओं के संग रहता है॥ १॥ रहाउ॥
21उस ठाकुर की लीला इतनी अद्भुत है कि वह क्षण में ही नीच आदमी को राजसिंहासन पर बैठाकर सम्मान दिलवा देता है। १॥
22दास नानक विनती करता है कि हे प्रभु ! मैं यही दान माँगता हूँ केि तू मेरे हृदय से कभी न विस्मृत हो।॥ २॥ १५ ॥ १०१॥
23बिलावलु महला ५ ॥
24अटल परमेश्वर पूजनीय है,
25मैं अपना मन-तन उसके समक्ष अर्पण करता हूँ, वही सब जीवों का पालनहार है॥ १॥ रहाउ॥
26वह जीवों को शरण देने में समर्थ है, उसकी महिमा अकथनीय है, वह सुखदाता, कृपा का सागर एवं बड़ा दयालु है।
27वह भक्तों को गले से लगाकर रखता है और उन्हें कोई गर्म हवा अर्थात् दुख नहीं लगने देता॥ १॥
28वह दामोदर स्वामी बड़ा दयाल है और संतंजनों का धन-संपति सब कुछ है।
29याचक नानक प्रभु-दर्शन ही माँगता है और चाहता है कि उसे संतजनों की चरण-धूलि ही मिले॥ २॥ १६॥ १०२॥
30बिलावलु महला ५ ॥
31भगवान का नाम-सिमरन करने से करोड़ों ही यत्न पूरे हो गए हैं।
32जब संतो की संगति में मिलकर हरि का गुणगान किया तो यमदूत भी निकट आने से डरने लगे ॥ १॥ रहाउ॥
33मनतन में प्रभु के चरण बसाने से जितने भी प्रायश्चित कर्म हैं, सब पूर्ण हो गए हैं।
34अब मेरा आवागमन, भ्रम एवं भय दूर हो गया है और जन्म-जन्मांतर के सब पाप जल गए हैं।॥ १॥
35निडर होकर जगदीश्वर का भजन करो, यह नाम रूपी पदार्थ भाग्यशालियों को ही मिलता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं