सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 81 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1वे विष रूप संसार के रसों को फीका समझते हैं।

2जब मेरा गोपाल प्रभु मुझ पर कृपालु हो गया तो मेरे मन ने सत्संगति को नाम की निधि स्वीकार कर लिया।

3प्रभु के प्रिय भक्त समस्त सुख एवं बड़ा आनंद प्राप्त करते हैं। वह हरि-नाम रूपी रत्न को अपने हृदय में पिरो कर रखते हैं।

4हे नानक ! प्राणों का आधार प्रभु उन्हें तिल भर समय के लिए भी विस्मृत नहीं होता। वे हर समय उसका नाम-सिमरन करके ही जीवित रहते हैं। ॥३॥

5डखणा ॥

6हे प्रभु ! तुम उन्हें ही मिलते हो, जिन्हें तुम अपना बना लेते हो।

7हे नानक ! प्रभु भक्तजनों से अपनी महिमा सुनकर स्वयं मुग्ध हो जाता है।॥१॥

8छंद॥

9भक्तो ने प्रेम की नशीली बूटी भगवान को प्रसन्न करके अपने मोह-जाल में फँसा लिया है।

10संतों की दया से अथाह परमेश्वर के गले लगकर वह शोभा प्राप्त करता है।

11वह भगवान के कण्ठ से लगकर शोभा प्राप्त करता है और उसके सभी दुख नाम के फलस्वरूप नष्ट हो गए हैं। उसकी भक्ति के गुणों के कारण प्रभु उसके वश में हो गया है

12जब गोबिंद प्रसन्न हुए तो सभी सुख उसके मन में आकर बस गए हैं और जन्म - मृत्यु के चक्र टूट गया है ।

13जीव रूपी स्त्री ने अपनी सत्संगी सहेलियों के साथ मिलकर मंगल गायन किया है। उसकी मनोकामनाएँ पूरी हो गई है। अब वह माया के मोह में नहीं फँसेगी ।

14हे नानक ! प्रिय प्रभु ने जिनका हाथ पकड़ा है उसे भवसागर ने स्पर्श नहीं किया II४ II

15डखणा ॥

16ईश्वर का नाम अमूल्य है। इसका मूल्य कोई भी नहीं जानता।

17जिनके मस्तक पर भाग्य रेखाएँ विद्यमान हैं, हे नानक ! वे ईश्वर की प्रीति का आनंद प्राप्त करते हैं॥

18छंद ॥

19हरिनाम इतना पावन है केि उसका मुख से उच्चारण करने वाले पवित्र हो जाते है। वे सभी धन्य हैं, जो प्रभु के नाम को सुनते हैं और प्रभु नाम महिमा को लिखने वालों का तो समूचा वंश ही भवसागर से पार हो जाता है।

20जिन्हें संतों की संगत मिल जाती हैं, वे परमात्मा के नाम में मग्न हो जाता है और ईश्वर का चिन्तन करता हैं।

21जो ब्रह्म का चिन्तन करते हैं वे अपना जीवन सफल कर लेते हैं और उन पर ठाकुर की बड़ी कृपा होती है।

22ईश्वर उनका हाथ थाम कर उन्हें यश प्रदान करता है और योनियों के आवागमन से मुक्त होकर जन्म-मरण के बंधन में नहीं पड़ते।

23दयालु एवं कृपालु सतिगुरु को मिलकर काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार नष्ट हो गए हैं।

24जगत् का स्वामी अकथनीय है और उसकी महिमा कथन नहीं की जा सकती। नानक उस पर तन-मन से न्यौछावर हैं। इसलिए वह उस पर कुर्बान जाता है॥ ५ ॥ १॥३ ॥

25श्रीरागु महला ४ वणजारा

26ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥

27जिस परमात्मा ने यह सृष्टि-रचना की है, उसका ‘हरि-हरि' नाम सबसे उत्तम है।

28वह हरि-परमेश्वर समस्त जीवों का पालन-पोषण करता है और वह राम सर्वव्यापक है।

29इसलिए सदैव उस परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। चूंकि उसके अतिरिक्त जीव का अन्य कोई सहारा नहीं है।

30जो व्यक्ति अपना चित्त माया के मोह में लगाकर रखते हैं, वे मृत्यु समय दुखी होकर विलाप करते हुए सबकुछ दुनिया में छोड़कर ही चले जाते हैं।

31हे नानक ! जो व्यक्ति भगवान का नाम-सिमरन करते हैं, अन्तिम समय भगवान का नाम ही उनका साथी बनता है॥ १॥

32मेरे भगवान के अलावा मेरा अन्य कोई सहारा नहीं है।

33हे मेरे वणजारे मित्र ! भगवान तो गुरु की शरण ग्रहण करने से ही मिलता है। यदि मनुष्य की किस्मत अच्छी हो तो ही भगवान मिलता है।॥१॥ रहाउ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं