गुरु ग्रंथ साहिब 819 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1जिसकी सेवा सफल हो जाती है, उसकी जगत् में जय-जयकार होती है॥ १॥
2जिसके वश में सारे जीव हैं, वह परमात्मा सर्वोच्च, अपार एवं अगम्य है।
3हे नानक ! मैं उस प्रभु की शरण में हूँ, जो सदैव मेरे साथ है॥ २ ॥ १० ॥ ७४ ॥
4बिलावलु महला ५ ॥
5पूर्ण गुरु की आराधना की है, इसलिए वह मुझ पर कृपालु हो गया है।
6उसने मुझे सन्मार्ग बता दिया है, जिससे मेरे यम के जाल टूट गए हैं।॥ १॥
7प्रभु का नाम गाने से मेरे दुख, भूख एवं संशय मिट गए हैं।
8मुझे सहज सुख, आनंद एवं उल्लास उत्पन्न हो गया है तथा सभी कार्य सिद्ध हो गए हैं। १॥ रहाउ॥
9प्रभु ने स्वयं मेरी रक्षा की है, जिससे सारी जलन बुझ गई है और मन शांत हो गया है।
10नानक तो उस प्रभु की शरण में ही है, जिसका जगत् में बड़ा प्रताप है ॥२॥ ११॥ ७५॥
11बिलावलु महला ५ ॥
12सारी धरती सुहावनी हो गई है, वह स्थान सफल हो गया है और सब काम पूरे हो गए हैं।
13नित्य राम का भजन करने से सारा भय दूर हो गया है और भ्रम भी मिट गया है॥ १॥
14साधुजनों के संग रहने से सहज सुख एवं शान्ति प्राप्त हो गई है।
15वह घड़ी बड़ी शुभ है, जब हरि-नाम का सिमरन किया जाता है॥ १॥ रहाउ॥
16हमें पहले कोई भी नहीं जानता था परन्तु अब संसार भर में लोकप्रिय हो गए हैं।
17नानक तो उस परमात्मा की शरण में है जो सबके दिल की भावना को जानने वाला है॥ २ ॥ १२ ॥ ७६ ॥
18बिलावलु महला ५ ॥
19प्रभु ने स्वयं रोग मिटाया है और सुख-शांति उत्पन्न कर दी है।
20जिसका प्रताप बहुत बड़ा है और रूप आश्चर्यमय है, उस परमात्मा ने ही देन प्रदान की है॥ १॥
21गोविंद गुरु ने कृपा करके मेरे प्रेिय की रक्षा की है।
22मैंने उसकी शरण ली है, जो सदैव मेरा सहायक है॥ १॥ रहाउ॥
23सेवक की प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती।
24हे नानक ! मेरे पास गोविंद का ही आत्गबल है, जो पूर्ण गुणों का भण्डार है॥ २ ॥ १३ ॥ ७७ ॥
25बिलावलु महला ५ ॥
26जिसे जीवन-दाता ईश्वर भूल गया है, वह जन्म-मरण के बन्धन में ही पड़ा हुआ है।
27जिस भक्त ने परब्रह्म की उपासना की है, वह दिन-रात उसके रंग में ही लीन रहता है।१॥
28उसकी सब अभिलाषाएँ पूरी हो गई हैं और मन में सहज सुख, शान्ति एवं बड़ा आनंद पैदा हो गया है।
29उसने साधु-संगति में गुणों के भण्डार परमात्मा का सिमरन कर सुख प्राप्त कर लिया है।१॥ रहाउ॥
30हे स्वामी ! तू अन्तर्यामी है, अपने सेवक की प्रार्थना सुनो।
31हे नानक के स्वामी ! तू सर्वव्यापक है ॥ २ ॥ १४ ॥ ७८ ॥
32बिलावलु महला ५ ॥
33परब्रह्म की शरण में आने से हमें कोई गर्म हवा भी नहीं लगती अर्थात् तनिक मात्र भी संताप नहीं लगता।
34हमारे इर्द-गिर्द राम-नाम की रेखा खिंची हुई है, जिससे कोई दुख नहीं लगता ॥ १॥
35मुझे पूर्ण सतगुरु मिल गया है, जिसने ऐसा विधान बनाया है।
36उसने मुझे राम-नाम रूपी औषधि दी है, जिसने एक परमात्मा में वृत्ति लगा दी है॥ १॥ रहाउ॥
37उस रखवाले परमात्मा ने हमारी रक्षा की है और सारी व्याधि मिटा दी है।
38हे नानक ! मुझ पर प्रभु-कृपा हो गई है और वही मेरा सहायक बना है ॥ २॥ १५ ॥ ७६ ॥
39बिलावलु महला ५ ॥
40परब्रह्म-गुरुदेव ने स्वयं अपने बालक (हरिंगोविंद) की रक्षा की है।
41मन में सुख-शांति एवं सहज आनंद उत्पन्न हो गया है और हमारी सेवा-भक्ति पूर्ण हो गई है॥ १॥ रहाउ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं