सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 817 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji

1नाम रूपी पूंजी से भक्तों के भण्डार भरे हुए हैं और उनमें कभी कोई कमी नहीं आती।

2प्रभु अगम्य एवं अपार है और उसके सुन्दर चरण-कमल मेरे मन एवं तन में बसते हैं।॥ २॥

3नाम की कमाई करने से सारे संतजन करतारपुर में सुखी रहते हैं और उन्हें किसी बात की कोई कमी नहीं।

4संतों की कृपा से मुझे पूर्ण प्रभु जगदीश मिल गया है।३॥

5सभी जय-जयकार कर रहे हैं और सत्य का स्थान बड़ा सुन्दर लग रहा है।

6हे नानक ! सुखों के भण्डार प्रभु -नाम को जपकर पूर्ण गुरु को पा लिया है॥ ४ ॥ ३३ ॥ ६३ ॥

7बिलावलु महला ५ ॥

8हरि की आराधना करने से जीव आरोग्य हो जाता है।

9यह हरि-नाम ही श्री राम चन्द्र की लाठी है, जिसने रोग को नाश कर दिया है।॥ १॥ रहाउ॥

10पूर्ण गुरु द्वारा हरि का जाप किया जाए तो नित्य सुख बना रहता है।

11मैं साधुओं की संगति पर न्योछावर हूँ, जिनके कारण संयोग प्राप्त हुआ है॥ १॥

12जिसका सिमरन करने से सुख प्राप्त होता है और वियोग दूर हो जाता है,

13नानक तो उस प्रभु की शरण में है, जो करने एवं करवाने में समर्थ है।२॥ ३४॥ ६४॥

14रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ५

15ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

16अन्य सब उपाय त्यागकर नाम रूपी दवा ली है।

17इससे ताप, पाप एवं सभी रोग मिट गए हैं और मन शीतल शांत हो गया है॥ १॥

18पूर्ण गुरु की आराधना करने से सारा दुख दूर हो गया है।

19रखवाले परमात्मा ने कृपा करके बचा लिया है॥ १॥ रहाउ॥

20प्रभु ने मेरी बांह पकड़कर मुझे भवसागर में से बाहर निकाल लिया है।

21हे नानक ! भगवान् का सिमरन करके मन-तन सुखी हो गया है और निडर हो गया हूँ॥ २ ॥ १ ॥ ६५ ॥

22बिलावलु महला ५ ॥

23मेरे मस्तक पर अपना हाथ धरकर ईश्वर ने मुझे अपनी सेवा में ही लीन किया है और नाम-दान दिया है।

24परब्रह्म की सेवा सफल है और इससे कोई हानि नहीं होती॥ १॥

25प्रभु स्वयं ही अपने भक्तों की मान-प्रतिष्ठा रखता है।

26साधुजन जो कुछ भी मन में सोचते हैं, परमात्मा उन्हें सम्मान देता है॥ १॥ रहाउ॥

27भक्तजन प्रभु को प्राणों से प्रिय हैं और वे उसके चरणों की शरण में ही पड़े रहते हैं।

28हे नानक ! वे सहज स्वभाव प्रभु को मिल जाते हैं और उनकी ज्योति परमज्योतेि में विलीन हो जाती है॥ २ ॥ २ ॥ ६६॥

29बिलावलु महला ५ ॥

30प्रभु ने स्वयं ही अपने चरणों का आसरा दिया है।

31जो भक्तजन प्रभु की शरण में पड़े हैं, उनका सदा के लिए प्रताप बन गया है॥ १॥

32अपार प्रभु रखवाला है और उसकी सेवा करने से मन निर्मल हो जाता है।

33गुरुदेव ने अमृतसर नगरी में राम-राज्य स्थापित कर दिया है॥ १॥ रहाउ॥

34सदैव भगवान का ध्यान करने से कोई विघ्न नहीं आता।

35हे नानक ! नाम की महिमा-गान करने से दुश्मन भी भाग जाते हैं।॥ २॥ ३॥ ६७ ॥

36बिलावलु महला ५ ॥

37साधुओं की सभा में मिलकर तन-मन से प्रभु की आराधना करनी चाहिए।

38ईश्वर का गुणगान एवं यश करने से यम दूर से ही भाग जाता है॥ १॥

39जो व्यक्ति नित्य राम-नाम जपता रहता है, वह सदैव जाग्रत रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं