गुरु ग्रंथ साहिब 810 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji
1जो व्यक्ति पहले आधे-आधे दाम के लिए मेहनत करते थे, अब वह धनवान माने जाते हैं। ३॥
2हे बेअंत गुणों के भण्डार ! मैं तेरी कौन-कौन-सी बड़ाई कर सकता हूँ ?
3नानक विनती करता है कि हे प्रभु ! कृपा करके मुझे अपना नाम दीजिए, मैं तेरे दर्शनों का अभिलाषी हूँ॥ ४॥ ७॥ ३७ ॥
4बिलावलु महला ५ ॥
5अहम्-भावना के कारण इन्सान नित्य झगड़ा करता रहता है और जीभ के स्वाद में फँसकर बड़ा लोभ करता है।
6वह अपने घर के सदस्यों के मोह में फँसा हुआ लोगों से छल-कपट करता है और झूठे विकारों इत्यादि में बँधा रहता है॥ १ ॥
7पूर्ण गुरु की कृपा से मैंने उनकी ऐसी दुर्दशा अपनी ऑखों से देखी है।
8राज्य, सम्पति, धन एवं यौवन ये सभी भगवन्नाम बिना व्यर्थ हैं।॥ १॥ रहाउ॥
9सुन्दर रूप वाले पदार्थ, धूप, सुगन्धि, वस्त्र एवं स्वादिष्ट भोजन इत्यादि सभी
10पापी मनुष्य के तन को छू कर दुर्गन्धयुक्त बन जाते हैं।॥ २॥
11अनेक योनियों में भटकने के पश्चात् जीव को अमूल्य मनुष्य-जीवन मिला है और इसकी देह क्षणभंगुर है।
12इस सुनहरी अवसर से चूक कर जीव दोबारा अनेक योनियों में भटकता है॥ ३॥
13प्रभु-कृपा से जिस व्यक्ति को गुरु मिल जाता है, वह अद्भुत रूप वाले हरि का नाम जपता रहता है।
14हे नानक ! उसे सहज सुख एवं आनंद प्राप्त हो जाता है और मन में अनहद नाद गूंजने लग जाते हैं।॥ ४॥ ८ ॥ ३८ ॥
15बिलावलु महला ५ ॥
16संतों के चरण जहाज बन गए हैं, जिस द्वारा अनेक जीव भवसागर से पार हो गए हैं।
17गुरु ने प्रभु मिलन का भेद बताया है और उन्हें संसार रूपी वन में भ्रमभुलैया से सन्मार्ग लगा दिया है। १॥
18सदैव ‘हरि-हरि-हरि-हरि' मंत्र को जपते रहो,
19हरि-नाम से प्रेम करो, उठते-बैठते तथा सोते वक्त हमेशा परमेश्वर को याद करो ॥ १॥ रहाउ॥
20जब साधु-संगति की तो काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार रूपी पाँच चोर भाग गए।
21नाम रूपी पूंजी को बचाते हुए उन्होंने बहुत लाभ हासिल किया है और वे शोभा सहित अपने घर लौट आए हैं ॥ २ ॥
22वहीं अब अटल आसन प्राप्त कर लिया है, उनकी सब चिन्ताएँ मिट गई हैं और अब वे कभी भी डगमगाते नहीं।
23आपने नेत्रों से प्रभु के साक्षात् दर्शन करने से उनका भ्रम-भुलावा मिट गया है॥ ३॥
24परमात्मा गुणों का गहरा सागर है, सर्व गुणों का मालिक है। फिर उसके कितने गुण वर्णन किए जा सकते हैं ?
25हे नानक ! | साधु की संगति में मिलकर हरि नाम रूपी अमृत पा लिया है। ४॥ ६॥ ३६ ॥
26बिलावलु महला ५ ॥
27साधु की संगति के बिना जितना भी हमारा जीवन था, वह व्यर्थ बीत गया है।
28लेकिन अब साधु-संगति मिलने से सारे भ्रम मिट गए हैं और हमारी गति हो गई है॥ १॥
29जिस दिन मुझे साधु मिले थे, मैं उस दिन पर बलिहारी जाता हूँ।
30मैं अपना तन, मन एवं प्राण बार-बार साधु पर न्योछावर करता हूँ॥ १॥ रहाउ ॥
31साधु ने मुझसे अहंत्व छुड़वा दिया है और इतनी दृढ़ता प्रदान की है कि
32अब मेरा यह मन सबकी चरण-धूलि बन चुका है और सारा अपनापन नाश हो गया है॥ २॥
33उन्होंने मेरे मन में पराई निंदा एवं दूसरों का बुरा सोचना एक क्षण में ही जला दिए हैं।
34अब मुझ में इतनी दया एवं प्रेम की भावना है कि सब जीवों में बस रहे ईश्वर को निकट ही देखता हूँ और उसे दूर नहीं समझता॥ ३॥
35मेरा तन-मन शीतल हो गए हैं और अब मैं संसार के बन्धनों से मुक्त हो गया हूँ।
36हे नानक ! प्रभु के दर्शन ही मेरा धन, प्राण हित-चित इत्यादि सबकुछ है॥ ४ ॥ १० ॥ ४० ॥
37बिलावलु महला ५ ॥
38हे ईश्वर ! मैं तेरे दास की सेवा करता हूँ और अपने केशों से उसके चरण झाड़ता हूँ।
39मैं अपना मस्तक उसे भेंट करता हूँ और उससे तेरे रसीले गुण सुनता हूँ॥ १॥
40हे दयाल ! तुम मुझे आन मिलो, क्योंकि तुझे मिलकर ही मेरा मन जीवन प्राप्त करता है।
41हे कृपा के सागर ! तुझे याद करके रात-दिन मेरे मन में आनंद बना रहता है॥ १॥ रहाउ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं