सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 80 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1वही सर्वोत्तम प्राणी ईश्वर को पाता है, जिसके पूर्व जन्म के कर्म शुभ होते हैं, वह लम्बे वियोग से मुक्त होकर अपने भगवान में मिल जाता है।

2मेरे चित्त के भीतर उसमें विश्वास उत्पन्न हो गया है जो प्रत्येक जगह अन्दर और बाहर व्यापक हो रहा है।

3नानक शिक्षा देते हैं कि हे मेरे प्रिय मित्र मन ! संतों की संगति में निवास करो। ॥४॥

4हे मेरे प्रिय मित्र मन ! हरि की प्रेम भक्ति में ऐसे लीन रह ।

5हे मेरे प्रिय मित्र मन ! जैसे मछली जल को मिल कर ही जीवित रहती है।

6जो व्यक्ति अमृत वाणी द्वारा भगवान के नाम रूपी जल को पीकर तृप्त हो जाते हैं, उनके मन में सर्व सुख आ बसते हैं।

7वह भगवान को पा लेते हैं और भगवान का मंगल गायन करते हैं। सतिगुरु उन पर प्रसन्न हो जाते हैं और उनकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।

8प्रभु उन्हें अपने साथ मिला लेता है। जगत् का स्वामी प्रभु उन्हें अपना नाम प्रदान करता है, जो नवनिधियाँ प्रदान करने वाला है।

9हे नानक ! जिसे संतों ने नाम-सिमरन की शिक्षा समझा दी है, वह भगवान की प्रेम-भक्ति में मग्न रहता है। ॥५॥१॥२॥

10सिरीराग के छंत महला ५

11ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

12डखणा ॥

13मेरा प्रिय-प्रभु मेरे अन्तर्मन में ही निवास करता है। फिर मैं उसके दर्शन कैसे करूँ।

14हे नानक ! संतों की शरण ग्रहण करने से प्राणों का आधार प्रभु मिल जाता है। ॥ १॥

15छंद॥

16प्रभु के चरण-कमलों से प्रेम करने की मर्यादा संतों के मन में बसती है।

17माया से प्रेम करना मर्यादा और नीति के विरुद्ध है।

18प्रभु के भक्तों को यह विपरीत मर्यादा अच्छी नहीं लगती। भगवान के दर्शनों के बिना उसके भक्त एक क्षण भर के लिए भी कैसे धैर्य कर सकते हैं ?

19जैसे मछली जल के बिना तड़प-तड़प कर मर जाती है, वैसे ही नाम के बिना प्रभु-भक्तो का मन एवं तन मृत समान हो जाते हैं।

20हे मेरे प्राणों के आधार प्रिय प्रभु ! मुझे मिलो, चूंकि संतों की सभा में मिलकर मैं तेरी महिमा-स्तुति करूँ।

21हे नानक के स्वामी ! मुझ पर कृपा करो, चूंकि मेरा मन एवं तन तेरे ही स्वरूप में समा जाए ॥ १॥

22डखणा ॥

23उस प्रभु के अलावा मुझे अन्य कोई भी दिखाई नहीं देता

24हे नानक ! सतिगुरु को मिलने से मेरे कपाट खुल गए हैं। अब मुझे ज्ञान हो गया है कि परमात्मा सर्वव्यापक है। ॥१॥

25छंद॥

26हे संतों के आधार प्रभु ! तेरे वचन बहुत सुन्दर एवं अपार हैं। मनुष्य को वाणी का ही चिन्तन करना चाहिए।

27जो व्यक्ति श्वास-श्वास एवं भोजन के ग्रास के साथ प्रभु के नाम का सिमरन करते हैं, उनकी प्रभु में पूर्ण आस्था हो जाती है।

28हे प्रभु ! तुम्हें हम क्यों विस्मृत करें? हे अनंत गुणों वाले प्रभु ! तुम ही मेरे प्राण हो। फिर तुझे एक क्षण भर के लिए भी क्यों विस्मृत किया जाए।

29मेरा प्रभु मुझे मनोवांछित फल प्रदान करता है। यह मेरे मन की पीड़ा को जानता है।

30हे अनाथों के नाथ प्रभु ! तू हमेशा समस्त जीवों के साथ रहता है। तेरा नाम-स्मरण करने से मानव जन्म जुए की बाजी की तरह व्यर्थ नहीं जाता।

31नानक की प्रभु के समक्ष यही प्रार्थना है कि हे प्रभु ! कृपा करके मुझे भवसागर से पार कर दीजिए ॥२ ॥

32डखणा ॥

33हे नानक ! संतों की चरण-धूलि में वही व्यक्ति स्नान करता है, जिस पर मालिक-प्रभु कृपालु होता है।

34जिन्हें हरि-नाम रूपी धन मिल जाता है, समझ लो उन्हें सभी पदार्थ मिल गए हैं॥ १॥

35छंद॥

36जगत् के स्वामी प्रभु का धाम अत्यंत सुन्दर है। वह प्रभु के भक्तों का निवास-स्थान है। प्रभु के भक्त उस सुन्दर स्थान की प्राप्ति की आशा में जीते हैं।

37वह अपने मन एवं तन द्वारा भगवान का नाम-सिमरन करने में मग्न रहते हैं। वे हरि-रस का पान करते हैं और सदैव स्थिर जीवन वाले हो जाते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं