सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 808 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji

1सभी लोग जगत् में अपनी जय-जयकार ही चाहते हैं।

2सतगुरु प्रभु सुप्रसन्न हो गया है, उसकी कृपा से किसी भी कार्य में विघ्न नहीं आ रहा ॥ १॥

3दयालु प्रभु जिसका भी पक्ष लेता है, सभी जीव उसके दास बन जाते हैं।

4हे नानक ! गुरु की ओर से मुझे सदैव बड़ाईयाँ मिलती रहती हैं।॥ २॥ १२॥ ३०॥

5बिलावलु महला ५ ॥

6ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

7परमात्मा ने मृत्यु-मण्डल रूपी ऐसा जगत् बनाया है, जैसे रेत के बने हुए घर-बार होते हैं।

8जैसे वर्षा की बूंदों से कागज नाश हो जाता है, वैसे ही जगत् को नाश होते देरी नहीं लगती ॥ १॥

9हे बंधु ! जरा मन लगाकर सुन, अपने मन में सत्य को विचार कर देख ले।

10सिद्ध, साधक, गृहस्थी एवं योगी सभी घर बार छोड़कर दुनिया से चले गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥

11जैसे रात्रि का सपना होता है, वैसे ही यह संसार है।

12हे गंवार आदमी ! दिखाई देने वाला यह सबकुछ ही नाश हो जाएगा, तू क्यों इससे लिपट रहा है॥ २॥

13अपनी ऑखें खोलकर देख, तेरे वे भाई एवं मित्र कहाँ हैं ?

14उनमें से कुछ दुनिया छोड़कर चले गए हैं और कुछ चले जाएँगे।अपनी बारी आने पर सारे ही चले जाते हैं।॥ ३॥

15जिन्होंने पूर्ण सतगुरु की सेवा की है, वे हरि के द्वार में स्थिर हो गए हैं।

16हे प्रभु ! नानक तेरा दास है। मेरी लाज रखो ॥ ४॥ १॥ ३१॥

17बिलावलु महला ५ ॥

18लोगों की तारीफ को तो अग्नि में डाल दूँगा।

19जैसे मुझे अपना प्यारा प्रभु मिल जाए, मैं वही बोल बोलूंगा ॥ १॥

20जैसे ही प्रभु जी मुझ पर दयालु हो जाए तो मैं उनकी भक्ति में लग जाऊँगा।

21मेरा मन वासनाओं से लिपटा हुआ है और गुरु को मिलकर इन्हें त्याग दूंगा ॥ १॥ रहाउ ॥

22मैं अपने प्रभु से बहुत प्रार्थना करूँगा और यह जीवन भी उसे कुर्बान कर दूँगा।

23मैंने अपने प्रिय के क्षण भर के सुहाग के लिए अन्य सभी धन पदार्थ उस पर न्योछावर कर दिए हैं।॥ २॥

24गुरु-कृपा से काम, क्रोध, मोह, लोभ एवं अहंकार इन पाँचों से संगति छूट गई है और सारे दोष एवं राग द्वेष भी दूर हो गए हैं।

25मेरे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो गया है, इसलिए अब मैं दिन-रात जागता रहता हूँ॥ ३॥

26जिसके मस्तक पर उत्तम भाग्य है, वही जीव सुहागेिन बनकर प्रभु की शरण में आया है।

27हे नानक ! प्रभु को पा कर उसका तन-मन शीतल हो गया है॥ ४॥ २॥ ३२ ॥

28बिलावलु महला ५ ॥

29जिसका उत्तम भाग्य होता है, उसे ही प्रभु का प्रेम रूपी लाल रंग लगता है।

30यह प्रेम-रंग विकारों की मेल से कभी मैला नहीं होता और न ही इसे अहंत्व रूपी कोई दाग लगता है॥ १॥

31सुखों के दाता प्रभु को पाकर सर्व सुख मिल गए हैं।

32वह अपने मन में सहज ही समाया रहता है और उससे सहज सुख छोड़ा नहीं जाता॥ १॥ रहाउ ॥

33उसे बुढ़ापा एवं मृत्यु प्रभावित नहीं करते और न ही कोई दुख प्राप्त हुआ है,

34क्योंकि नामामृत का पान करके वह संतुष्ट हो गया है और गुरु ने उसे अमर कर दिया है॥ २॥

35जिसने अमूल्य हरि-नाम को चखा है, वही इसके स्वाद को जानता है।

36हरि-नाम का मूल्य मुझसे बताया नहीं जा सकता, मैं अपने मुँह से कहकर क्या बोलूं ?॥ ३॥

37हे परब्रह्म ! तेरा दर्शन सफल है और तेरी वाणी गुणों का खजाना है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं