सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 802 · Raag Bilaaval · Guru Arjan Dev Ji

1तेरे गुण असंख्य हैं।

2मुझ अनाथ ने तेरी शरण ली है।

3हे श्री हरि ! ऐसी कृपा करो, ताकेि मैं तेरे चरणों का ध्यान करता रहूँ॥ १॥

4दया करो और मेरे मन में आ बसो।

5मुझ निर्गुण को अपने ऑचल में लगा लीजिए॥ रहाउ॥

6यदि प्रभु याद आ जाए तो कोई विपत्ति कैसे आ सकती है?

7हरि के सेवक को यम की पीड़ा सहन नहीं करनी पड़ती।

8हरि का सिमरन करने से सर्व दुखों का नाश हो जाता है और

9उसके साथ प्रभु सदा बसता रहता है॥ २॥

10प्रभु का नाम मेरे मन एवं तन का आसरा है।

11नाम विस्मृत होने से शरीर खाक हो जाता है।

12प्रभु याद आने से सभी कार्य पूर्ण हो जाते हैं।

13भगवान् को भुलाने से जीव सबका मोहताज बन जाता है॥ ३॥

14प्रभु के चरण-कमल से मेरी प्रीति लग गई है और

15सारी दुर्मति की रीति भूल गई है।

16मेरे मन एवं तन में हरि नाम रूपी मंत्र का जाप होता रहता है।

17हे नानक ! भक्तों के घर में सदैव आनंद कायम रहता है॥ ४॥ ३ ॥

18रागु बिलावलु महला ५ घरु २ यानड़ीए कै घरि गावणा

19ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

20हे मेरे प्यारे प्रभु ! मेरे मन में एक तेरा ही सहारा है।

21मेरी अन्य समस्त चतुराइयों व्यर्थ हैं और एक तू ही मेरा रखवाला है॥ १॥ रहाउ॥

22हे प्यारे ! जिसे पूर्ण सतगुरु मिल जाता है, वह आनंदित हो जाता है।

23गुरु की सेवा वही करता है, जिस पर तू दयालु हो जाता है।

24स्वामी गुरुदेव सफल मूर्त है और वह सर्वकला सम्पूर्ण है।

25हे नानक ! गुरु ही परब्रह्म परमेश्वर है जो सदा हर जगह हाजिर है॥ १॥

26जिन्होंने अपने प्रभु को जान लिया है, मैं उनकी शोभा सुन-सुनकर जी रहा हूँ।

27वे हरि-नाम की आराधना करते रहते हैं, नाम का बखान करते रहते हैं, और उनका मन हरि-नाम में लीन रहता है।

28हे प्रभु ! तेरा सेवक तेरे भक्तों की सेवा का दान माँगता है किन्तु तेरी पूर्ण कृपा से ही यह हो सकता है।

29हे मेरे स्वामी ! नानक की तुझसे एक यही प्रार्थना है कि मैं तेरे भक्तजनों के दर्शन करूं ॥ २ ॥

30हे प्यारे ! वही व्यक्ति भाग्यशाली कहलाने के हकदार हैं, जिनका निवास संतों की संगति में है।

31अमृत-नाम की आराधना करने से निर्मल मन में प्रकाश हो जाता है।

32हे मेरे प्यारे ! उनका जन्म-मरण का दुख नाश हो जाता है और यम का सारा भय समाप्त हो जाता है।

33हे नानक ! जो जीव अपने प्रभु को भाता है, उसे ही उसके दर्शन प्राप्त होते हैं।॥ ३॥

34हे मेरे स्वामी ! तू उच्च, अपार एवं बेअंत है, तेरे गुणों को कौन जानता है ?

35तेरा यश गाने एवं सुनने वालों का उद्धार हो जाता है तथा उनके अनेक पाप विनष्ट हो जाते हैं।

36तू पशु, प्रेत एवं मूर्खो का भी कल्याण कर देता है और तू पत्थरों को भी पार करवा देता है।

37दास नानक तेरी शरण में आया है और सदा तुझ पर ही बलिहारी जाता है॥ ४॥ १॥ ४॥

38बिलावलु महला ५ ॥

39हे सखी ! विषय-विकारों का फीका रस छोड़ दे और हरि-नाम महारस का ही पान करो।

40इस नाम-रस को चखे बिना सारी दुनिया विकारों के जल में डूब गई है और यह मन कभी सुखी नहीं होता।

41कोई मान, महत्व एवं शक्ति सुखी होने का साधन नहीं है, इसलिए साधुओं की दासी बन जाओ।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं