गुरु ग्रंथ साहिब 801 · Raag Bilaaval · Guru Raam Daas Ji
1ईश्वर हर जगह भरपूर है।
2राम का नाम जल एवं पृथ्वी में विद्यमान है।
3नित्य दुखों का नाश करने वाले हरि का यश गाना चाहिए॥ १ ॥ रहाउ ॥
4प्रभु ने हमारा जन्म सफल कर दिया है
5क्योकि हमने दुखनाशक हरि का जाप किया है
6हमें मुक्तिदाता गुरु मिल गया है।
7हरि ने हमारी जीवन-यात्रा सफल कर दी है,
8अतः संगत में मिलकर हरि के गुण गाते रहते हैं।॥ १॥
9हे मेरे मन ! राम-नाम की आशा करो,
10यह द्वैतभाव को नाश कर देगा।
11जो आदमी आशा में निराश अर्थात् निर्लिप्त रहता है,
12वह भगवान् को मिल जाता है।
13जो राम नाम का गुणगान करता है
14नानक उसके चरण स्पर्श करता है ॥ २॥ १॥ ७॥ ४॥ ६॥ ७॥ १७॥
15रागु बिलावलु महला ५ चउपदे घरु १
16ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
17जो कुछ नजर आ रहा है, उससे ही मोह लगा हुआ है।
18हे अविनाशी प्रभु ! मैं तुझे कैसे मिलूं ?
19कृपा करके मुझे मार्गदर्शन कीजिए और
20साधु संगति के ऑचल से लगा दो॥ १॥
21इस विष रूपी संसार से कैसे पार हुआ जाए ?
22हे भाई ! सतगुरु रूपी जहाज इससे पार करवा देता है॥ १॥ रहाउ॥
23माया पवन की तरह झुलाती है,
24लेकिन हरि के भक्त सदैव स्थिर रहते हैं।
25जो आदमी हर्ष एवं शोक से निर्लिप्त रहता है,
26उसके सिर पर गुरु आप रखवाला बना हुआ है॥ २॥
27हे भाई ! माया रूपी नागिन ने सब जीवों को लपेटा हुआ है।
28इन्सान अभिमान में यूं जल रहे हैं, जिस तरह दीपक को देखकर पतंगा जल जाता है।
29चाहे जीव-स्त्री सारे श्रृंगार कर ले किन्तु वह फिर भी अपने पति-प्रभु को नहीं पा सकती।
30जब प्रभु कृपालु हो जाता है तो वह गुरु से मिला देता है॥ ३॥
31मैं उदास हुई फिरती थी लेकिन गुरु ने मुझे एक रत्न बता दिया।
32यह अमूल्य हीरा किसी भी उपाय से नहीं मिलता।
33यह काया ही हरि का मन्दिर है, जिसमें यह लाल मौजूद है।
34जब गुरु ने अहंत्व रूपी पर्दा खोल दिया तो मैं लाल को देखकर आनंदित हो गई॥ ४॥
35जिसने हरि रस को चखा है, उसे ही स्वाद आया है,
36जिस तरह मिठाई खाकर गूंगा मन में आश्चर्यचकित हो जाता है।
37आनंद रूपी प्रभु मुझे हर जगह नजर आया है।
38हे नानक ! हरि के गुण गाकर उसमें ही समा गया हूँ॥ ५ ॥ १॥
39बिलावलु महला ५ ॥
40गुरुदेव ने सर्व कल्याण कर दिया है और
41सेवक को अपनी सेवा में लगा लिया है।
42अदृष्ट एवं अभेद परमात्मा का जाप करने से कोई विघ्न नहीं आता ॥ १॥
43भगवान् का गुणगान करने से सारी धरती पावन हो गई है।
44हरि-नाम का ध्यान करने से सारे पाप विनष्ट हो गए हैं।॥ १॥ रहाउ॥
45भगवान स्वयं ही हर जगह पर विद्यमान है,
46सृष्टि के आदि एवं युगों के आरम्भ से उसका बड़ा प्रताप है।
47गुरु की अनुकंपा से कोई संताप प्रभावित नहीं करता ॥ २॥
48गुरु के चरण मन को बड़े मीठे लगे हैं।
49वह निर्विघ्न हर जगह बस रहा है।
50सतगुरु की प्रसन्नता से सभी सुख हासिल हो गए हैं।॥ ३॥
51परब्रह्म प्रभु मेरा रखवाला बन गया है,
52जहाँ कहीं भी देखता हूँ, मुझे साथ ही दिखाई देता है।
53हे नानक ! मालिक-प्रभु ही अपने दास का प्रतिपालक है॥ ४॥ २॥
54बिलावलु महला ५ ॥
55हे मेरे प्रियतम प्रभु ! तू सुखों का भण्डार है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं