सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 7 · Jap · Guru Nanak Dev Ji

1नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है।

2जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप हैII २९ II

3एक ब्रह्म की किसी रहस्यमयी युक्ति द्वारा माया की प्रसूति से तीन पुत्र पैदा हुए।

4इन में से एक ब्रह्मा सृष्टि रचयिता, एक विष्णु संसार का पोषक, और एक शिव संहारक के रूप में दरबार लगाकर बैठ गया।

5जिस तरह उस अकाल पुरुष को भला लगता है उसी तरह वह इन तीनों को चलाता है और जैसा उसका आदेश होता है वैसा ही कार्य ये देव करते हैं।

6वह अकाल पुरुष तो इन तीनों को आदि व अन्त समय में देख रहा है किंतु इनको वह अदृश्य स्वरूप निरंकार नज़र नहीं आता, यह अत्याश्चर्यजनक बात है।

7नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है।

8जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३०॥

9उसका आसन प्रत्येक लोक में है तथा प्रत्येक लोक में उसका भण्डार है।

10उस परमात्मा ने सभी भण्डारों को एक ही बार परिपूर्ण कर दिया है।

11वह सृजनहार रचना कर करके सृष्टि को देख रहा है।

12हे नानक ! उस सत्यस्वरूप निरंकार की सम्पूर्ण रचना भी सत्य है।

13नमस्कार है, सिर्फ उस सर्गुण स्वरूप निरंकार को नमस्कार है।

14जो सभी का मूल, रंग रहित, पवित्र स्वरूप, आदि रहित, अनश्वर व अपरिवर्तनीय स्वरूप है॥ ३१॥

15एक जिव्हा से लाख जिव्हा हो जाएँ, फिर लाख से बीस लाख हो जाएँ।

16फिर एक-एक जिव्हा से लाख-लाख बार उस जगदीश्वर का एक नाम उच्चारण करें, अर्थात् निशदिन उस प्रभु का नाम सिमरन किया जाए।

17इस मार्ग से पति-परमेश्वर को मिलने हेतु बनी नाम रूपी सीढ़ियों पर चढ़ कर ही उस अद्वितीय प्रभु से मिलन हो सकता है।

18वैसे तो ब्रह्म-ज्ञानियों की बड़ी-बड़ी बातें सुनकर निकृष्ट जीव भी देहाभिमान में अनुकरण करने की इच्छा रखते हैं।

19परंतु गुरु नानक जी कहते हैं कि उस परमात्मा की प्राप्ति तो उसकी कृपा से ही होती है, वरन् ये तो मिथ्या लोगों की मिथ्या ही बातें है ॥ ३२ ॥

20अकाल पुरुष की कृपा-दृष्टि के बिना इस जीव में कुछ भी कहने व चुप रहने की शक्ति नहीं है अर्थात् रसना को चला पाना जीव के वश में नहीं है।

21माँगने की भी इसमें ताकत नहीं है और न ही कुछ देने की समर्था है।

22यदि जीव चाहे कि मैं जीवित रहूँ तो भी इसमें बल नहीं है, क्योंकि कई बार मनुष्य उपचाराधीन ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है, मरना भी उसके वश में नहीं है।

23धन, सम्पत्ति व वैभव प्राप्त करने में भी इस जीव का कोई बल है, जिन के लिए मन में जो जुनून होता है।

24श्रुति वेदों के ज्ञान का विचार करने का भी इसमें बल नहीं है।

25संसार से मुक्त होने की षट्-शास्त्रों में दी गई युक्तियाँ धारण कर लेने की शक्ति भी इसमें नहीं है।

26जिस अकाल पुरुष के हाथ में ताकत है वही रचना करके देख रहा है।

27गुरु नानक जी कहते हैं कि फिर तो यही जानना चाहिए कि इस संसार में न कोई स्वेच्छा से नीच है, न उत्तम है, वह प्रभु जिस को कर्मानुसार जैसा रखता है वैसा ही वह रहता है॥ ३३॥ ।

28रात्रियों, ऋतुओं, तिथियों, सप्ताह के वारों,

29वायु, जल, अग्नि व पाताल आदि यावत प्रपंच हैं।

30स्रष्टा प्रभु ने उस में पृथ्वी रूपी धर्मशाला स्थापित करके रखी हुई है, इसी को कर्मभूमि कहते हैं।

31उस धर्मशाला में नाना प्रकार के जीव हैं, जिनकी अनेक भांति की धर्म-कर्म की उपासना की युक्ति है और उनके श्वेत-श्यामादि अनेक प्रकार के वर्ण हैं।

32उनके अनेक प्रकार के अनंत नाम हैं।

33संसार में विचरन कर रहे उन अनेकानेक जीवों को अपने शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ही उन पर विचार किया जाता है।

34विचार करने वाला वह निरंकार स्वयं भी सत्य है और उसका दरबार भी सत्य है।

35वही उसके दरबार में शोभायमान होते हैं जो प्रामाणिक संत हैं,

36जिनके माथे पर कृपालु परमात्मा की कृपा का चिन्ह अंकित होता है।

37प्रभु के दरबार में कच्चे-पक्के होने का परीक्षण होता है।

38हे नानक ! इस तथ्य का निर्णय वहाँ जाकर ही होता हैII ३४ ॥ ।

39(कर्मकाण्ड में) धर्मखण्ड का यही नियम है; जो पूर्व पंक्तियों में कथन किया गया है।

40(गुरु नानक जी) अब ज्ञान खण्ड का व्यवहार वर्णन करते हैं।

41(इस संसार में) कितने प्रकार के पवन, जल, अग्नि हैं, और कितने ही रूप कृष्ण व रुद्र (शिव) के हैं।

42कितने ही ब्रह्मा इस सृष्टि में अनेकानेक रूप-रंगों के भेष में जीव पैदा करते हैं।

43कितनी ही कर्म भूमियों, सुमेर पर्वत, धुव भक्त व उनके उपदेष्टा हैं।

44इन्द्र व चंद्रमा भी कितने हैं, कितने ही सूर्य, कितने ही मण्डल व मण्डलांतर्गत देश हैं।

45कितने ही सिद्ध, विद्वान व नाथ हैं, कितने ही देवियों के स्वरूप हैं।

46कितने ही देव, दैत्य व मुनि हैं और रत्नों से भरपूर कितने ही समुद्र हैं।

47कितने ही उत्पत्ति के स्रोत हैं (अण्डज-जरायुजादि), कितनी प्रकार की वाणी है (परा, पश्यन्ती आदि) कितने ही बादशाह हैं और कितने ही राजा हैं।

48कितनी ही वेद-श्रुतियाँ हैं, उनके सेवक भी कितने ही हैं, गुरु नानक जी कहते हैं कि उसकी रचना का कोई अन्त नहीं है; इन सबके अन्त का बोध ज्ञान-खण्ड में जाने से होता है, जहाँ पर जीव ज्ञानयान हो जाता हैII ३५ II

49ज्ञान खण्ड में जो ज्ञान कथन किया है वह प्रबल है।

50इस खण्ड में रागमयी, प्रसन्नतापूर्ण व कौतुकी आनंद विद्यमान है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं