गुरु ग्रंथ साहिब 79 · Siree Raag · Guru Raam Daas Ji
1वस्त्रों के स्थान पर हरि का नाम दो और शोभा बढ़ाने वाले आभूषणों इत्यादि के स्थान पर भगवान का नाम ही दो। भगवान के नाम से मेरा विवाह कार्य संवर जाएगा।
2भगवान की भक्ति से ही विवाह-कार्य सुखदायक होता है। सतिगुरु ने मुझे भगवान की भक्ति का ही दान दिलवाया है।
3इस दान से समूचे ब्रह्माण्ड एवं समस्त खण्डों में मेरी शोभा हो गई है। कोई अन्य दान इस दान की बराबरी नहीं कर सकता।
4हरिनाम के दहेज के अतिरिक्त जो लोग दान-दहेज का प्रदर्शन करते हैं, वे मिथ्याडम्बरी और अहंकारी हैं।
5हे मेरे बाबुल ! मुझे दहेज में केवल हरि-नाम का ही दान व दहेज प्रदान करो॥४॥
6हे मेरे बाबुल ! प्रभु-परमेश्वर सर्वव्यापक है। हे मेरे बाबुल ! हरि प्रभु को मिलकर जीव-स्त्री की लता विकसित होती है।
7अनेक युगों से गुरु वंश सदैव चला आता है।
8जो गुरु के माध्यम से नाम-सिमरन करते हैं वहीं गुरु का वंश होता है। सतिगुरु का वंश प्रत्येक युग में चलता है।
9सर्वशक्तिमान परमेश्वर कदापि मरता या जन्मता नहीं। वह जो कुछ देता है सदैव ही बढ़ता जाता है।
10हे नानक ! अद्वितीय प्रभु संतों का संत है। ईश्वर के नाम का उच्चारण करने से पत्नी सुशोभित हो जाती है।
11हे मेरे बाबुल ! मुझे हरि-रूप पति मिला है, हरि सर्वव्यापक है। अपने पति से मिलकर पत्नी की अपने परिवार में अभिवृद्धि हुई है॥५॥१॥
12श्रीरागु महला ५ छंत
13ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
14हे मेरे प्रिय मित्र मन ! भगवान का नाम-सिमरन करो। हे मेरे प्रिय मित्र मन !
15भगवान का नाम हमेशा तेरे साथ रहेगा। अतः भगवान के नाम का ध्यान करो !
16यह तेरे साथ रहेगा और तेरी सहायता करेगा। नाम-सिमरन करने वाला कोई भी दुनिया से खाली हाथ नहीं जाता।
17जो भगवान के चरण-कमलों में अपना चित लगाता है, उसे मनोवांछित फल प्राप्त होता है।
18यह प्रभु जल एवं थल में सर्वव्यापक है। वह समस्त जीवों के हृदय में विद्यमान है और सबको अपनी कृपा-दृष्टि से देखता हैं।
19नानक शिक्षा देते हैं केि हे मेरे प्रिय मन ! संतों की संगति करके माया के भ्रम-जाल को नष्ट कर दो ॥१॥
20हे मेरे प्रिय मित्र मन ! भगवान के बिना माया का जगत् रूप प्रसार झूठा है।
21यह संसार विष से भरा हुआ सागर है।
22अतः ईश्वर के चरणों को अपना जहाज बनाओ फिर तुझे कोई दुःख एवं भय नहीं लगेगा।
23जिस भाग्यशाली को पूर्ण गुरु मिल जाता है, वह आठ प्रहर प्रभु नाम का भजन करता रहता है।
24हे प्रभु ! तू सृष्टि के आदि एवं युगों से ही अपने सेवकों का स्वामी है। तेरा नाम भक्तो का आधार है।
25नानक शिक्षा देते हैं किं हे मेरे प्रिय मित्र मन ! भगवान के बिना जगत् का यह माया-प्रसार झूठा है ॥२॥
26हे मेरे प्रिय मित्र मन ! हरिनाम के व्यापार में ही लाभ है।
27हे मेरे मित्र मन ! ईश्वर के द्वार पर आसन जमा ले।
28जिन प्राणियों ने अगाध व भेद-रहित ईश्वर का द्वार पकड़ा है, वे वहीं समाधिस्थ हो गए हैं।
29वे जन्म-मरण तथा आवागमन से मुक्त हो गए हैं, उनके संशयों एवं दुःखों का नाश हो जाता है।
30चित्रगुप्त द्वारा उनके कर्मों का लेखा-जोखा भी मिट जाता है और यमदूत विवश हो जाते हैं।
31नानक शिक्षा देते हैं केि हरि नाम रूपी व्यापार लाभदायक है। अत: इस व्यापार को लेकर अपने साथ ले जाओ ॥३॥
32हे मेरे प्रिय मित्र मन ! संतों की संगति में निवास करो।
33हे मेरे मित्र मन ! ईश्वर का नाम जपने से ज्ञान का प्रकाश उज्ज्वल होता है।
34प्रभु जगत् का स्वामी है और जीवों को सुख देने वाला है। उसकी आराधना करने से समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं