सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 799 · Raag Bilaaval · Guru Raam Daas Ji

1हे मन ! अपनी जीभ से राम-नाम जप।

2मस्तक पर लिखे भाग्य लेखानुसार मैंने गुरु को पा लिया है और हृदय में भगवान् का निवास हो गया है॥१॥ रहाउ॥

3हे श्री हरि ! माया में ग्रस्त हुआ प्राणी भटकता रहता है, अपने दास को इससे बचा लो।

4जैसे दैत्य हिरण्यकशिपु ने भक्त प्रहलाद को खंभे से बांध लिया था, शरण में आने पर तूने उसे बचा लिया था, वैसे ही हमें बचा लो॥ २॥

5श्री हरि ने बड़े-बड़े पापियों को भी पावन कर दिया हैं, में किस-केिस की दास्तान बयान करूं।

6जिस चमार के हाथ में चमड़ा पकड़ा होता था और वह मृत पशु ढोता रहता था, लेकिन जब वह शरण में आया तो भगवान् ने उसका भी उद्धार कर दिया।॥३॥

7हे प्रभु ! तू दीनदयाल है, अपने भक्तजनों को संसार के जन्म-मरण से पार करवाने वाला है।अतः मुझ जैसे पापी को पापों से बचा लो।

8दास नानक प्रार्थना करता है कि हे श्री हरि ! मैं तेरे दासों का दास हूँ मुझे अपने दासों के दासों का दास बना लो ॥ ४॥ १॥

9बिलावलु महला ४ ॥

10हे अजन्मा प्रभो ! हम मूर्ख,बेवकूफ, अज्ञान बुद्धि वाले तेरी शरण में आए हैं।

11हे मेरे ठाकुर ! हम बड़े पत्थरदिल, गुणहीन एवं कर्महीन हैं, कृपा करके हमें बचा लो॥ १॥

12हे मेरे मन ! राम-नाम का भजन कर ;

13गुरु के उपदेश से ही हरि-रस प्राप्त होता है, इसलिए अन्य सभी निष्फल कायों को त्याग दो॥ १॥ रहाउ॥

14हे प्रभु ! तूने अपने भक्तजनों को भवसागर से पार किया है, इसलिए मुझ गुणविहीन को भी बचा लो, इसमें तेरी ही उपमा है।

15हे मेरे ठाकुर ! तेरे अतिरिक्त मेरा अन्य कोई सहारा नहीं है। बड़ी तकदीर से ही तेरा जाप करने को मिलता है। २॥

16नामविहीन लोगों का जीना धिक्कार योग्य है, क्योंकि उन्हें दुखों की भारी चिंता लगी रहती है।

17उन्हें बार-बार योनियों के चक्र में घुमाया जाता है, ऐसे व्यक्ति बड़े बदनसीब, मूर्ख तथा कर्महीन होते हैं।॥ ३॥

18प्रभु का नाम ही भक्तजनों के जीवन का आधार है, विधाता ने पूर्वजन्म से उनके शुभ कर्म लिखे होते हैं।

19हे नानक ! उन लोगों का जन्म सफल है, जिन्हें गुरु ने नाम दृढ़ कर दिया है।॥ ४॥ २॥

20बिलावलु महला ४ ॥

21मेरा चित्त विष रूपी माया के मोह में फँसा हुआ है और इसमें खोटी बुद्धि की बहुत मैल भर गई है।

22हे प्रभु ! मैं तेरी सेवा नहीं कर सकता, फिर मैं मूर्ख भवसागर से कैसे पार होऊँगा ?॥ १॥

23हे मेरे मन ! ईश्वर का नाम जप।

24प्रभु ने अपने भक्त पर कृपा की है और वह गुरु से मिलकर भवसागर से पार हो गया है॥ १॥ रहाउ॥

25हे मेरे स्वामी प्रभु ! तू मेरा पिता है और तू ही मेरा ठाकुर है। मुझे ऐसी बुद्धि दीजिए ताकि मैं तेरा यश करता रहूँ!

26जैसे लकड़ी के साथ लगकर लोहा नदी से पार हो जाता है, वैसे ही जो तुम्हारी भक्ति के साथ लगे हैं, उनका भी उद्धार हो गया है॥ २॥

27जिन्होंने परमात्मा की उपासना नहीं की, उन मायावी पुरुषों की मति बड़ी ओच्छी एवं मलिन है।

28ऐसे व्यक्ति भाग्यहीन एवं दुराचारी हैं और वे बारंबार जन्मते मरते एवं पुनःपुनः मोत को प्राप्त होते रहते हैं।॥ ३॥

29हे मेरे स्वामी हरि ! जिन्हें तुम अपने साथ मिला लेते हो, वह गुरु रूपी संतोष के सरोवर में स्नान करते रहते हैं।

30हे नानक ! भगवान् का भजन करने से जिसकी खोटी बुद्धि की मैल दूर हो गई है, वह भवसागर से पार हो गया है॥ ४ ॥ ३॥

31बिलावलु महला ४ ॥

32हे मेरे संतजन भाईयो ! आओ, सभी मिलकर बैठो और मिलकर हरि की कथा करो।

33हरि का नाम कलियुग में जहाज है, गुरु मल्लाह है तथा उसके शब्द द्वारा भवसागर से पार हो जाओ ॥ १॥

34हे मेरे मन ! हरेि के गुण उच्चरित करो।

35जिनके माथे पर भाग्य हैं, उन्होंने ही प्रभु के गुण गाए हैं। साधसंगत में मिलकर पार हो जाओ ॥ १ ॥ रहाउ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं